गठबंधन का वेग टेकऑफ से पहले ब्रेक ,गठबंधन में कांग्रेस- दोष*

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*गठबंधन का वेग टेकऑफ से पहले ब्रेक ,गठबंधन में कांग्रेस- दोष*

इंजी० अनुराग पाण्डेय
कार्यवाहक संपादक
मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़

ममता की कटुता ने मोदी विरोधी गठबंधन की राजनीति को टेकऑफ से पहले ही ब्रेक लगा दिया है. पितृदोष की तरह ही गठबंधन के लिए कांग्रेसदोष भारी साबित हो रहा है. जहां गठबंधन की जरूरत नहीं है उन राज्यों में कांग्रेस बिखरती जा रही है. सीधी टक्कर वाली लोकसभा की लगभग 195 सीटों में से पिछले चुनाव में बीजेपी ने 175 सीट जीती थीं. इन सीटों पर नए सिरे से खड़े होने की बजाय कांग्रेस के पैर पहले से ज्यादा लड़खड़ाते हुए दिखाई पड़ रहे हैं.

कांग्रेस को समझना होगा कि खुद में जब ताकत नहीं बची तो फिर थके हाथों से दूसरों के सहारे कोई भी नहीं चल पाता. सहारा देने वाले भी इतनी राजनीति तो समझ ही रहे हैं कि सीधे मुकाबले वाले राज्यों में जब कांग्रेस बीजेपी की टक्कर में खड़ी नहीं हो पा रही है तो फिर उनके सहारे उनके राज्यों में कांग्रेस को खड़े होने का मौका देकर कोई क्षेत्रीय दल आत्मघात क्यों करेगा?

विपक्ष के गठबंधन के संयोजक तो फिर से बीजेपी के साथ चले गए हैं अब तो ममता बनर्जी ने भी साथ छोड़ दिया है. पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर ममता ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं. केरल में कम्युनिस्ट भी आंखें दिखा रहे हैं. वायनाड में राहुल गांधी के सामने ही प्रत्याशी उतार दिया है. केरल के मार्क्सवादी यह कह रहे हैं कि गठबंधन इसलिए हो रहा है कि बीजेपी से मुकाबला करना है. राहुल गांधी गठबंधन के मजबूत राज्य में चुनाव लड़ने की बजाय भाजपा के मजबूत राज्य में चुनाव लड़ें तो गठबंधन मजबूत होगा.

लोकसभा चुनाव में गठबंधन के भंवर में फंसकर कांग्रेस अपने जनाधार को भी खोती जा रही है. उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ पहले भी कांग्रेस ने गठबंधन किया था लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात निकले थे. फिर उनके साथ समझौते से धरातल पर कोई भी असर पड़ने की संभावना नहीं है. बिहार और महाराष्ट्र में कांग्रेस का गठबंधन पहले से जिन दलों के साथ है वही अभी भी बना हुआ है. महाराष्ट्र में तो शिवसेना भी कांग्रेस को आंखें दिखा रही है.

विचारधारा को तिलांजलि देकर सरकारों का सत्तासुख तो गठजोड़ कर लिया जा सकता है लेकिन चुनाव में जनता ऐसे बेमेल गठबंधन को हमेशा सबक ही सिखाती है. इसीलिए शायद शिवसेना छिटकने की जुगाड़ बिठा रही है. यूपी में अखिलेश यादव को भी कांग्रेस के अलावा कोई ठौर नहीं है और कांग्रेस का तो अकेले वहां कोई शोर ही नहीं है. बिहार में लालू यादव और कांग्रेस एक ही नाव पर सवार हैं. इस गठबंधन को जीवनरक्षा बंधन कहें तो ज्यादा ठीक होगा.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने साल भर से चल रही कांग्रेस की गठबंधन सियासत को एक झटके में तोड़ दिया. मायावती सबसे अलग ही लड़ेंगीं. ममता बनर्जी और कांग्रेस के जींस समान हैं. इसलिए शायद ममता बनर्जी कांग्रेस को ज्यादा अच्छी तरह से समझती हैं. उनके गठबंधन की ममता के पीछे छुपी क्रोर्र्ता की अनुभूति ममता बनर्जी को बहुत पहले से है.

तमिलनाडु में डीएमके से कांग्रेस का गठबंधन हो गया है. सीट शेयरिंग भी हो गई है लेकिन डीएमके उत्तर भारत में कांग्रेस के लिए एटम बम साबित हो रही है. हिंदुत्व, सनातन धर्म, राम और रामायण पर डीएमके के विचार उनके गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को उत्तर भारत में हिरोशिमा और नागासाकी जैसा अनुभव देने वाले हैं.

कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसका पूरे राष्ट्र में प्रभाव माना जा सकता है. कमजोर होती कांग्रेस ने गठबंधन के सहारे जिन भी राज्यों में पांव जमाने की कोशिश की उन राज्यों में उसके पाँव जमने के बजाय उखड़ते चले गए. उत्तरप्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जब से कांग्रेस ने वहां गठबंधन कर दूसरे दलों के साथ मिलकर सीमित सीटों पर चुनाव लड़ने की शुरुआत की तब से जो सिलसिला शुरू हुआ अब वह विलुप्त राजनीतिक जनाधार के रूप में साबित हुआ है.

कांग्रेस ने नीतीश कुमार के सहारे मोदी विरोधी गठबंधन की राजनीति के ताने-बाने बुनने की शुरुआत की थी. उनके गठबंधन की बैठकों में नीतीश कुमार सबसे आगे दिखाई पड़ते थे. जब चुनाव मैदान में जाने का समय आया तो नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ चले गए. इसके बाद भी कांग्रेस गठबंधन की राजनीति की असलियत समझ नहीं पाई. अब जब ममता बनर्जी ने झटका दिया है तब कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सभी सीटों पर प्रत्याशी तक उतरने की स्थिति में नहीं है.

गठबंधन की राजनीति में मजबूत दल और मजबूत नेता होने पर सहयोगियों को साथ लेने का राजनीतिक लाभ मिलता है. जब कोई दल स्वयं कमजोर और हताश हो तो ना तो कोई गठबंधन सहयोगी साथ देता है और ना ही जनता में कोई संदेश जाता है. गठबंधन की पूरी राजनीति पीएम मोदी के खिलाफ रची गई थी. एक तरफ मजबूत नेता जिसने देश को मजबूती प्रदान की है और दूसरी तरफ हांफती कांग्रेस सीधे मुकाबले वाले राज्यों में गठबंधन को अपना राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश कर रही है.

राजनीति में विरोध नकारात्मकता की इस सीमा तक नहीं जाना चाहिए कि ऐसा लगने लगे कि राजनीतिक विरोध के चक्कर में देश के विकास और अच्छी नीतियों का ही विरोध किया जाने लगा है. बीजेपी एनडीए और मोदी की सरकार केंद्र में कभी बनेगी, इसकी ही कल्पना भारत की स्थापित राजनीति और राजनीतिज्ञों ने नहीं की थी. अब 10 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं फिर भी मोदी विरोधी राजनीति करने वाले मानसिक रूप से यह स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि भारत की राजनीतिबदल गई है. विकास और गुड गवर्नेंस राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया है. गठबंधन की राजनीति विकास और गुड गवर्नेंस के नए दौर में पहुंच चुकी है.

नकारात्मकता हमेशा लाभकारी नहीं होती. गति के लिए नेगेटिव फोर्स की जरूरत होती है. इलेक्ट्रॉन, पॉजिट्रॉन ,न्यूट्रॉन जैसे नेगेटिव पॉजिटिव और बैलेंसिंग एक्ट के साथ जैसे अस्तित्व का संचालन होता हैं, वैसे ही किसी भी फील्ड में पॉजिट्रॉन के बिना केवल नेगेटिव फोर्स के साथ काम नहीं किया जा सकता. कोई भी व्यवस्था सस्टेन तभी हो सकती है जब पॉजिटिव और नेगेटिव के बीच बैलेंस मेंटेन होगा. कांग्रेस में यह बैलेंस बिगड़ गया है. कांग्रेस का टारगेट मोदी का विरोध करना है. इसके लिए केवल नेगेटिव इमेज उन्हें भारी नुकसान पहुंचा रही है. उनकी यही इमेज गठबंधन को भी तोड़ने की जिम्मेदार कही जा सकती है.

एनडीए का कुनबा बढ़ता जा रहा है. आंध्र प्रदेश में टीडीपी के साथ समझौता हो चुका है. उड़ीसा में भी बीजेडी के साथ चर्चा चल रही है. पंजाब में अकाली दल भी एनडीए से जुड़ने की ओर बढ़ रहा है. बीजेपी तमाम सकारात्मक परिस्थितियों के बाद भी अपने कुनबे को बढ़ाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है और दूसरी तरफ कांग्रेसदोष के कारण मोदी विरोधी गठबंधन के वेग पर चुनावी मैदान में उतरने के पहले ही ब्रेक लग गया है.

जिन-जिन राज्यों में अभी विपक्षी गठबंधन का स्वरूप थोड़ा बहुत दिखाई पड़ रहा है वह भी चुनाव घोषणा के साथ कई राज्यों में बिखर सकता है. विरोध को ताकत बना लेना भारत का इतिहास है. नरेंद्र मोदी का जब-जब जितनी ताकत से विरोध हुआ है तब उतनी ही ताकत से उन्होंने वापसी की है. चुनाव में हार और जीत अपनी जगह है लेकिन गठबंधन की राजनीति तो चुनाव के पहले ही हारती हुई दिखाई पड़ रही है.

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