300 दिनों के अर्जित अवकाश के लिए दर-दर भटकने को मजबूर सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक: हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अनूपपुर जनजाति कार्य विभाग पर उठे गंभीर सवाल
अनूपपुर प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी दफ्तरों की लालफीताशाही ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि न्याय पाने के लिए भी नागरिकों को अदालतों की देहरी तक घसीटा जाना इस व्यवस्था की एक वीभत्स और स्थायी सच्चाई बन चुकी है। अपनी पूरी सेवा निष्ठा के साथ समर्पित करने के बाद जब एक शिक्षक सेवानिवृत्त होता है, तो उसे सम्मानजनक विदाई की बजाय अपने ही हक और स्वत्वों के लिए दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर किया जाना इस तंत्र की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
अनूपपुर जिले में जनजाति कार्य विभाग के अंतर्गत संचालित व्यवस्था की यह बानगी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि किस प्रकार जिम्मेदार अधिकारी अपने पदीय दायित्वों से मुंह फेरे बैठे हैं। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चचाई से सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक संजय कुमार सिन्हा का यह मामला केवल एक व्यक्ति के अर्जित अवकाश नकदीकरण का नहीं है, बल्कि उस खोखले प्रशासनिक ढांचे पर एक करारा तमाचा है जो कागजी दावों के विपरीत धरातल पर शिक्षकों और कर्मचारियों का मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
न्याय की आस में महीनों से भटक रहे सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चचाई से प्रधानाध्यापक के पद से 31 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त हुए संजय कुमार सिन्हा के पास सेवाकाल के दौरान 300 दिनों से अधिक का अर्जित अवकाश शेष था। सेवानिवृत्ति के फौरन बाद उन्हें उनके वैध स्वत्वों का भुगतान मिलना चाहिए था, जिसके लिए उन्होंने समय पर विधिवत आवेदन भी संबंधित कार्यालय में प्रस्तुत कर दिया था। परंतु विडंबना यह रही कि महीनों बीत जाने के बाद भी विकासखंड शिक्षा अधिकारी जैतहरी कार्यालय की सुस्ती और प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण उनके इस अधिकार को फाइलों के मकड़जाल में उलझा दिया गया।
प्रशासनिक उदासीनता से उपजी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना
जीवन के स्वर्णिम काल को शिक्षा के मंदिरों में खपा देने वाले एक शिक्षक को जब सेवानिवृत्ति के बाद अपनी ही गाढ़ी कमाई और अर्जित अवकाश की नकदी के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ें, तो यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। श्री सिन्हा और उनके परिजनों को लगातार महीनों तक अधिकारियों के दरवाजे पर गुहार लगानी पड़ी, लेकिन जिम्मेदार अमले के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। इस अकारण देरी और प्रशासनिक उपेक्षा ने न केवल सेवानिवृत्त शिक्षक को आर्थिक संकट से रूबरू कराया, बल्कि उन्हें भारी मानसिक प्रताड़ना का भी सामना करने को विवश किया।
उच्च न्यायालय की शरण लेने को हुए विवश
विभागीय स्तर पर अनगिनत चक्कर काटने और गुहार लगाने के बावजूद जब विभाग की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो पीड़ित प्रधानाध्यापक ने न्याय की उम्मीद में उच्च न्यायालय की शरण ली। उन्होंने अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय, जबलपुर के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका (WP No. 43297/2026) दायर की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को स्पष्ट किया कि वे किसी नए आदेश को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि अपने लंबित आवेदन पर तय समय-सीमा के भीतर न्यायसंगत निर्णय की गुहार लगा रहे हैं।
हाईकोर्ट की दो टूक: एक माह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की एकलपीठ के माननीय न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने बेहद महत्वपूर्ण और सख्त आदेश पारित किया है। न्यायालय ने जनजाति कार्य विभाग, अनूपपुर के सक्षम प्राधिकारी को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के एक माह के भीतर कानून सम्मत, सकारण आदेश पारित करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। हालांकि अदालत ने प्रकरण के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है, किंतु तय समय-सीमा के भीतर निर्णय लेने की इस बाध्यता से अब सुस्त पड़े प्रशासनिक अमले की नींद उड़ना तय है।
सहायक आयुक्त सरिता नायक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
इस पूरे प्रकरण ने अनूपपुर जिले में जनजाति कार्य विभाग की कार्यशैली और सहायक आयुक्त सरिता नायक के प्रशासनिक नियंत्रण को कटघरे में खड़ा कर दिया है। शासन के स्पष्ट नियम हैं कि सेवानिवृत्ति के वक्त ही कर्मचारी के समस्त स्वत्वों का अंतिम भुगतान कर दिया जाना चाहिए, ताकि उसे वृद्धावस्था में पैसों के लिए संघर्ष न करना पड़े। परंतु सहायक आयुक्त सरिता नायक के कार्यकाल में शिक्षकों और कर्मचारियों का इस तरह चंद रुपयों के लिए उच्च न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होना यह बताने के लिए काफी है कि विभाग के भीतर किस कदर अराजकता और संवेदनहीनता व्याप्त है।








