कॉरपोरेट लालच की भेंट चढ़ते किसान:
मुआवजे में भी बड़ी हेराफेरी की आशंका
अनूपपुर। किशोर सोनी। अनूपपुर जिले के कोतमा क्षेत्र में मेसर्स अनूपपुर थर्मल एनर्जी म.प्र. प्रा.लि.का प्रस्तावित रेलवे कॉरिडोर अब केवल विकास का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि किसानों के साथ ‘धोखाधड़ी’ का पर्याय बनता जा रहा है। पावर प्लांट प्रबंधन न केवल भूमि अर्जन की कानूनी प्रक्रिया को धता बता रहा है, बल्कि अन्नदाताओं को मिलने वाले उचित मुआवजे और उनके अधिकारों पर भी डकैती डालने की तैयारी में है। 16 जनवरी 2026 की ‘नियम विरुद्ध’ जनसुनवाई इसी षड्यंत्र का एक हिस्सा नजर आती है।
मुआवजे में ‘खेल’ और किसानों का आर्थिक शोषण
पावर प्लांट द्वारा किए जा रहे भूमि अधिग्रहण में सबसे बड़ा प्रहार किसानों की आर्थिक स्थिति पर किया जा रहा है। सूत्रों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अनुसार:
पारदर्शिता का अभाव: किसानों को यह स्पष्ट नहीं बताया जा रहा है कि उनकी भूमि का बाजार मूल्य किस आधार पर तय किया गया है।
कौड़ियों के दाम पर जमीन: ‘उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार
अधिनियम-2013′ के बावजूद, किसानों को वह मुआवजा देने से बचा जा रहा है जो उनके भविष्य को सुरक्षित कर सके।
पुनर्वास की अनदेखी: केवल जमीन छीनना ही लक्ष्य है, जबकि विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और रोजगार की शर्तों को कागजों में दबा दिया गया है।
किसानों का आरोप है कि पावर प्लांट अपने रसूख का इस्तेमाल कर कलेक्टर गाइडलाइन और वास्तविक बाजार दरों के बीच के अंतर का फायदा उठाकर किसानों को आर्थिक नुकसान पहुँचाना चाहता है।
पावर प्लांट की तानाशाही: अधिकारों का खुला दुरुपयोग
यह स्पष्ट है कि पावर प्लांट प्रबंधन प्रशासन के साथ मिलकर ‘शक्ति का केंद्रीकरण’ कर रहा है। मध्य प्रदेश भूमि अर्जन नियम-2015 के नियम 13 को दरकिनार कर, सभी गांवों की संयुक्त जनसुनवाई बैहाटोला में रखना एक रणनीतिक चाल है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसान टुकड़ों में बंट जाएं और अपनी सामूहिक ताकत से मुआवजे की सही मांग न उठा सकें।
एक निजी कंपनी के लिए प्रशासन का इतना ‘उदार’ होना और पेसा (PESA) कानून की अनिवार्य ग्राम सभाओं को नजरअंदाज करना यह साबित करता है कि जिले की राजनीति और प्रशासन मूकदर्शक बनकर पावर प्लांट के हितों की चौकीदारी कर रहे हैं।
अधिसूचित क्षेत्र में ‘संवैधानिक संकट’
कोतमा एक पूर्णतः अनुसूचित क्षेत्र है। यहाँ संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के तहत ग्राम सभा सर्वोपरि है। पावर प्लांट द्वारा पेसा नियम-6 के तहत पृथक ग्राम सभाएं आयोजित न करना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि आदिवासियों और स्थानीय किसानों की अस्मिता पर चोट है। प्रबंधन यह भूल रहा है कि बिना ग्राम सभा की सहमति के किया गया कोई भी अधिग्रहण ‘अवैध’ की श्रेणी में आता है।
जनप्रतिनिधियों की चेतावनी: “रद्द हो जनसुनवाई”
जिला पंचायत सदस्य रामजी ‘रिंकू’ मिश्रा और उप सरपंच श्याम मुरारी शर्मा ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि 16 जनवरी की जनसुनवाई को स्थगित नहीं किया गया, तो इसे शासन-प्रशासन और पावर प्लांट की मिलीभगत माना जाएगा।
”पावर प्लांट किसानों के खून-पसीने की कमाई पर अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहता है। हम अन्नदाता के हितों को दरकिनार नहीं होने देंगे। अगर मुआवजा पारदर्शी नहीं हुआ और जनसुनवाई नियमों के तहत नहीं हुई, तो पूरा क्षेत्र उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगा।” –
: जनता की अदालत में होगा फैसला?
प्रशासनिक अधिकारियों की चुप्पी और पावर प्लांट की बढ़ती मनमानी ने अनूपपुर में एक तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर दी है। किसान अब अपनी जमीन बचाने के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार इस कॉरपोरेट तानाशाही पर लगाम लगाएगी या फिर किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा?







