कोतमा के 8 गांवों में ‘अधिग्रहण’ की आहट

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विकास की पटरी पर कौन होगा सवार और किसका उजड़ेगा संसार?

​प्राइवेट कंपनी के लिए बिछाया जा रहा ‘कॉरिडोर’ का जाल; 16 जनवरी की लोकसुनवाई से पहले उठ रहे हैं कई सुलगते सवाल, क्या प्रशासन के पास है इनका जवाब?
​कोतमा/अनूपपुर।अजय मिश्रा। कोतमा के आसमान में ‘विकास’ का धुआं एक बार फिर मंडराने लगा है। सरकारी कागजों पर स्याही अभी सूखी भी नहीं है कि किसानों की पुश्तैनी जमीनों पर ‘रेलवे कॉरिडोर’ दौड़ाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। मेसर्स अनूपपुर थर्मल एनर्जी प्रा. लिमिटेड के लिए बिछाई जाने वाली इस पटरी के नीचे उन 8 गांवों के किसानों के सपने दबने वाले हैं, जिनकी जमीन को ‘अधिग्रहण’ के सुंदर नाम से लपेटा जा रहा है
जिले के कोतमा अनुभाग में इन दिनों सरकारी कागजों की हलचल ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। मेसर्स अनूपपुर थर्मल एनर्जी प्रा. लिमिटेड के प्रस्तावित रेलवे कॉरिडोर के लिए कटकोना, बैहाटोला, डोंगरियाखुर्द, भाटाडांड, मेनटोला, कोरियाखुर्द, कोठी और तरसिली की उपजाऊ जमीनों को अधिग्रहित करने की प्रक्रिया तेज हो गई है। आगामी 16 जनवरी को बैहाटोला में होने वाली ‘लोक सुनवाई’ केवल एक बैठक नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों के भविष्य का फैसला है, जिनकी आजीविका का एकमात्र सहारा उनकी पुश्तैनी जमीन है।

​लोक सुनवाई की आड़ में ‘खानापूर्ति’ का खेल?

​प्रशासन ने अधिसूचना जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उन ग्रामीणों को ‘सामाजिक समाघात निर्धारण’ (SIA) जैसी जटिल रिपोर्ट के तकनीकी शब्द समझ आते हैं? सरकारी तंत्र इसे पारदर्शी प्रक्रिया बता रहा है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि अक्सर ऐसी सुनवाइयों में जनता की आवाज को ‘विकास’ के शोर में दबा दिया जाता है।

अधिकारियों की मुस्तैदी: तहसीलदारों और मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की फौज इस तरह मुस्तैद की गई है जैसे कोई जंग फतह करनी हो। काश, इतनी ही मुस्तैदी उन गड्ढों को भरने में दिखाई जाती जो इसी क्षेत्र की सड़कों पर ‘विकास’ का मुंह चिढ़ा रहे हैं।

​प्रशासन और कंपनी को घेरते सवाल
​इस पूरे मामले में ‘अखबार’ प्रशासन और संबंधित निजी कंपनी से वे सवाल पूछता है, जो प्रभावित किसानों के मन में दफन हैं:
​निजी मुनाफे के लिए बलि क्यों?: जब प्रोजेक्ट एक ‘प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनी का है, तो उसके लिए सरकारी मशीनरी इतनी मुस्तैद क्यों है? क्या सरकार का काम जनता की जमीन की रक्षा करना है या कॉर्पोरेट घरानों के लिए जमीन ‘क्लीयर’ करवाकर देना?
​रोजगार की लिखित गारंटी कहां है?: मुआवजे के चंद रुपयों से चंद महीने कट सकते हैं, पूरी जिंदगी नहीं। क्या प्रशासन इस कॉरिडोर में प्रभावित गांवों के शिक्षित युवाओं को स्थाई और सम्मानजनक पद पर नौकरी देने की लिखित गारंटी देगा? या वे अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को मजबूर होंगे?
​पारदर्शिता या केवल ‘वीडियो’ की औपचारिकता?: पत्र में वीडियो रिकॉर्डिंग की बात कही गई है। सवाल यह है कि क्या यह रिकॉर्डिंग जनता के विरोध को सुनने के लिए है, या विरोध करने वालों को चिह्नित कर उन पर दबाव बनाने के लिए? क्या इस वीडियो को सार्वजनिक पोर्टल पर लाइव दिखाया जाएगा?
​बाजार भाव और सरकारी दर का अंतर कौन पाटेगा?: अक्सर सरकारी दरें बाजार भाव से बहुत कम होती हैं। किसान अपनी जमीन जिस कीमत पर बेचेगा, क्या उसी कीमत पर उसे कहीं और उतनी ही उपजाऊ जमीन मिल पाएगी? क्या प्रशासन ‘जमीन के बदले जमीन’ के विकल्प पर विचार करेगा?
​पर्यावरण और भविष्य का क्या?: रेलवे कॉरिडोर के निर्माण और थर्मल एनर्जी प्रोजेक्ट से होने वाले प्रदूषण का खामियाजा ये 8 गांव ही भुगतेंगे। क्या सामाजिक समाघात रिपोर्ट में इस ‘धीमे जहर’ से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान की भरपाई का कोई प्रावधान है?

सियासत का ‘मौन’ व्रत
​दुखद पहलू यह है कि इलाके के रसूखदार नेता, जो मंचों से ‘माटी पुत्र’ होने का दावा करते हैं, इस संवेदनशील मुद्दे पर ‘मौन व्रत’ धारण किए हुए हैं। विपक्ष की भूमिका भी केवल बयानों तक सीमित है। ऐसे में किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

​: जनता की अदालत में होगा फैसला

​16 जनवरी को बैहाटोला में होने वाली सुनवाई केवल सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनकर न रह जाए, इसके लिए ग्रामीणों को एकजुट होना होगा। विकास के हम विरोधी नहीं हैं, लेकिन वह विकास ‘विनाश’ की बुनियाद पर खड़ा नहीं होना चाहिए। अगर प्रशासन के पास इन सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं हैं, तो यह लोकसुनवाई केवल एक ‘स्वांग’ बनकर रह जाएगी।साहब! रेलवे कॉरिडोर तो बन जाएगा, ट्रेनें भी फर्राटा भरेंगी, बस दुआ कीजिए कि उस ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए किसी को वो किसान न दिख जाए जो अपनी ही जमीन पर अब मजदूरी कर रहा होगा।