आर्थिक विश्लेषक दुर्गेश गौड़ ने बताई मजबूत बैंकिंग तंत्र की बात
शिवपुरी। रंजीत गुप्ता। एक मजबूत बैंकिंग तंत्र किसी भी मजबूत अर्थव्यव्स्था का आधार होता है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यव्स्था जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के प्रति संकल्पित है। उसके लिए मजबूत बैंकिंग व्यवस्था भविष्य की कुंजी है। भारत द्वारा विकसित राष्ट्र लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिव्यक्ति आय को 2047 तक बढ़ाकर लगभग $18000 से $20000 करना होगा। जो एक सुद्रण बैंकिंग व्यवस्था व उसके द्वारा विभिन्न मदो मे किए गए वित्त पोषण के बिना संभव नहीं है।
भारत की बैंकिंग व्यवस्था अक्सर सामान्य नहीं रही है। 1991 की बैलेंस ऑफ पेमेंट समस्या के बाद से कोरोना काल तक बहुधा भारतीय बैंकिंग तंत्र चुनौतियों से दो चार होता पाया गया है। अभी हाल ही के वर्षों तक बैंकिंग क्षेत्र के हालत नासाज बने हुए रहे। 2008 में अमेरिका जनित सब प्राइम संकट व उसके बाद के वर्षों में घोटालों के खुलासों के चलते घरेलू अर्थव्यवस्था पॉलिसी पैरालिसिस का शिकार रही। इस दौरान फंसे कर्जों में नाटकीय वृद्धि देखी गई। व बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह लड़खड़ाती नजर आई। 2019 में सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों का सकल एनपीए 25% की अप्रत्याशित ऊंचाई तक गया। जबकि प्रावधान के बाद कई सार्वजनिक बैंकों का शुद्ध एनपीए 10% से 19% के बीच था। उक्त स्थिति में सुधार के लिए आरबीआई को त्वरित सुधार एक्शन (पी सी ए) का सहारा लेना पड़ा। व 11 बैंकों को पीसीए के तहत डाला गया। पीसीए वह मानक होता है। जहां बैंकों को नया उधर देने से पूर्व अपने रिटर्न ऑन एसेट को लाभ में लाने के साथ पूंजी पर्याप्तता को भी उचित स्तर तक लाना होता है। इसी दौरान बैंकिंग फ्रोड व एनबीएफसी क्षेत्र की कंपनियों में जारी अनियमितताओं के चलते भी बैंकिंग उद्योग शिथिल रहा।
बैंकों की खस्ताहाल स्थिति, अर्थव्यवस्था पर पढ़ रहे उसके नकारात्मक प्रभाव, गिरती आर्थिक विकास दर आदि को थामने के लिए सरकार द्वारा सुधारात्मक उपायों को अपनाया गया। जिनमें समेकन भी एक प्रमुख उपाय था। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विलय प्रक्रिया को अपनाकर बैंकों की संख्या 27 से घटाकर 12 लाई गई। जिससे बैंकों का आकार बढ़ाया गया। व पूंजी की उपलब्धता को सुनिश्चित किया गया। सरकार ने विगत वर्षों में सार्वजनिक बैंकों में क्रमशः 2018 में 90000 करोड़ , 2019 में 109000 करोड़, 2020 में 70000 करोड़ रुपए का पूंजीकरण किया। परिणामस्वरूप बैंकों को पुनः सुदृढ़ता प्राप्त हुई व गत वर्ष सभी 12 सरकारी बैंकों ने लाभ दर्ज किया। वित्त वर्ष 2025 में उनका समेकित लाभ 1.78 लाख करोड़ रुपए रहा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा 2023/25 के बीच सरकार को लगभग 55000 करोड़ रुपए का लाभांश भी प्राप्त हुआ। यहां गौरतलब है कि 2018 में इन्हीं बैंकों ने 85390 करोड़ रुपए का घटा दर्ज किया था। जिसमें एसबीआई भी शामिल था।
वर्तमान में किसी भी सार्वजनिक बैंक का शुद्ध एनपीए 1% से कम ही है। बैंकों का प्रावधान कवरेज अनुपात (पीसीआर) भी 2014/15 के 49% से बढ़कर 2024/25 में 92% हो गया है, जो बैंकों की वित्तीय मजबूती का सूचक है। फंसे हुए कर्जों के मोर्चे पर सकल एनपीए 2.2% व शुद्ध एनपीए 0.52% रह गया। जो ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर है। फंसे कर्जों में भारी कमी, पूंजी की उपलब्धता में सुधार, बैंकों का लाभ में आना, विदेशी निवेश को आकर्षित करना आदि वह सुधार हैं जिनपर विकसित भारत की बुनियाद तैयार की जा सकती है।
वहीं सरकार द्वारा सरकारी बैंकों के नेतृत्व में उत्कृष्टता एवं अधिक पेशेवरता लाने के लिए प्रमुख चार निदेशकों में से एक प्राइवेट क्षेत्र से लेने का निर्णय सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था को और खुला बनाता है। बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा को 74% व मताधिकार सीमा को 26% पर स्थित रखा गया है। लेकिन हाल ही में विदेशी वित्तीय संस्थाओं जैसे कि ब्लैकस्टोन द्वारा फेडरल बैंक में, अमेरिका की बारवर्ग पिंकस एवं आबुधाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी द्वारा आईडीएफसी फर्स्ट में, अमीरात एडीबी द्वारा आरबीएल बैंक में व जापानी दिग्गज सुमितोमो मितसुई द्वारा यस बैंक में किया गया निवेश दर्शाता है कि भारतीय बैंकिंग उद्योग विदेशी पूंजी के लिए आकर्षक बना हुआ है। अब जरूरी यह है कि बैंकों को सुधारों के प्रति निरंतरता बरतना चाहिए। व घटते कासा डिपॉजिट्स को उठाने के लिए नवाचारों को प्रोत्साहित करना चाहिए। ताकि नेट इंटरेस्ट मार्जिन में स्थिरता कायम रह पाए। बैंकों को आत्ममुग्धता से बचते हुए नए कर्जों के प्रति सावधानीपूर्वक रवैया अपनाना चाहिए। व अवसरों पर ध्यान देते हुए दूरगामी आर्थिक लक्ष्यों को साधना चाहिए।








