शासकीय शिक्षा व्यवस्था में बड़ा ‘अटैचमेंट खेल’: 11 साल तक बिना पढ़ाए लिया वेतन

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प्रतिनियुक्ति समाप्त हुई तो 44 दिन में फिर हुए ‘सेटिंग’ से संलग्न!
अनूपपुर। अनूपपुर जिले में शिक्षा विभाग की साख को तार-तार करने वाला एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने सरकारी तंत्र की नीयत और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बच्चों के भविष्य को संवारने का दम भरने वाला विभाग खुद ‘अटैचमेंट खेल’ और ‘कागजी हाजिरी’ का अखाड़ा बन चुका है। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पसला में पदस्थ माध्यमिक शिक्षक (विज्ञान) संतोष कुमार तिवारी का मामला सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सत्ता, रसूख और विभागीय सांठगांठ का नंगा नाच है, जहां एक शिक्षक बिना पढ़ाए सालों-साल मोटा वेतन उठाता रहा और बच्चे विज्ञान के शिक्षक के लिए तरसते रहे।
वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपे गए दस्तावेजों और प्राचार्य के पत्रों ने इस समूचे भ्रष्टाचार की परतें उधेड़ कर रख दी हैं। यह खबर केवल एक शिक्षक की अनियमितता की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर करारा प्रहार है, जहां नियमों को ताक पर रखकर चहेते कर्मचारियों को मलाईदार कुर्सियों पर बैठाया जाता है और ग्रामीण अंचल के मासूम बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया जाता है।

संविदा से नियमितीकरण तक नियमों की धज्जियां
प्राप्त शिकायतों के अनुसार, संतोष कुमार तिवारी की प्रथम नियुक्ति 07 सितंबर 2006 को संविदा शाला शिक्षक वर्ग-2 के पद पर हुई थी। मध्य प्रदेश शासन के स्पष्ट नियमानुसार नियुक्ति के बाद 3 वर्ष की परिवीक्षा अवधि में लगातार शिक्षण कार्य कराना अनिवार्य होता है। आरोप है कि शिक्षक तिवारी ने अपनी परिवीक्षा अवधि के दौरान तीन महीने भी बच्चों को नहीं पढ़ाया। इसके बावजूद 11 सितंबर 2009 को उन्हें नियम विरुद्ध तरीके से अध्यापक पद पर नियमित कर दिया गया। इतना ही नहीं, परिवीक्षा अवधि के दौरान वर्ष 2008 में नियमित/स्वाध्यायी छात्र के रूप में एम.एससी. (स्नातकोत्तर) की डिग्री भी हासिल कर ली गई, जिसकी अनुमति पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

. 11 वर्ष की प्रतिनियुक्ति का फर्जीवाड़ा और अनूपपुर में ‘अटैचमेंट’
शिक्षक की प्रतिनियुक्ति 03 नवंबर 2012 को जनपद शिक्षा केन्द्र जैतहरी में खण्ड अकादमिक समन्वयक के पद पर की गई थी। लेकिन रसूख के बल पर उन्होंने वहां कार्य करने के बजाय अपना संलग्नीकरण जिला शिक्षा केन्द्र अनूपपुर में करा लिया। मजे की बात यह रही कि उनका वेतन बीएसी जैतहरी के पद के विरुद्ध आहरित होता रहा। 11 वर्षों तक चले इस लंबे ‘अटैचमेंट’ के बाद जब कलेक्टर एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत अनूपपुर ने 21 मार्च 2025 को आदेश क्रमांक 346 के तहत प्रतिनियुक्ति समाप्त कर मूल विभाग (सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग) में वापस भेजा, तो लगा कि अब सुधार होगा। मूल विभाग में वापसी के बाद जब शिक्षक की पदस्थापना किसी विद्यालय में की जानी चाहिए थी, तभी महज 44 दिनों के भीतर यानी 01 मई 2025 को आदेश क्रमांक 1/248670/2025 के जरिए उन्हें पुनः जिला शिक्षा केन्द्र अनूपपुर में संलग्न कर दिया गया। उन्हें ए.पी.सी. (अकादमिक एवं प्रशिक्षण) प्रभारी डाइट का प्रभार सौंप दिया गया। इसके बाद 06 मई 2025 को आदेश क्रमांक 1818 के तहत शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पसला में पदस्थापना तो दिखाई गई, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही थी।

स्कूल से नदारद, पोर्टल पर हाजिरी नहीं फिर भी मिल रहा वेतन
शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पसला में पदस्थापित होने के बाद भी शिक्षक संतोष कुमार तिवारी कभी विद्यालय में उपस्थित नहीं हुए। राज्य शासन द्वारा अनिवार्य किए गए ई-एच.आर.एम.एस. पोर्टल पर भी उनकी कोई हाजिरी दर्ज नहीं हुई। इसके बावजूद विकासखंड शिक्षा अधिकारी जैतहरी द्वारा उनका वेतन लगातार जारी किया जाता रहा। सवाल उठता है कि बिना उपस्थिति और बिना संकुल प्राचार्य के सत्यापन के फर्जी उपस्थिति के आधार पर किस नियम के तहत जनता के पैसे से वेतन आहरित किया जा रहा है?

प्राचार्य ने खोली पोल, पत्र लिखकर जताई लाचारी
कार्यालय प्राचार्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पसला, जिला अनूपपुर ने दिनांक 31 अगस्त 2026 को पत्र क्रमांक/शि.स्था./2026-27/63 के माध्यम से सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग को पत्र लिखकर पूरे मामले का पर्दाफाश किया। प्राचार्य ने स्पष्ट लिखा कि 19 मई 2025 को संस्था में उपस्थित होने के बाद से शिक्षण सत्र 2025-26 एवं 2026-27 में शिक्षक द्वारा कोई शैक्षणिक कार्य नहीं किया गया। इसके कारण विद्यालय में विज्ञान विषय का स्तर लगातार गिर रहा है और विद्यार्थियों का भविष्य गर्त में जा रहा है। प्राचार्य ने शिक्षक को जिला शिक्षा केन्द्र से तत्काल मुक्त कर मूल संस्था पसला में भेजने की गुहार लगाई है।

नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ और वित्तीय अनियमितता
एक तरफ शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में विज्ञान विषय के शिक्षकों की भारी कमी है, ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे प्रयोगशाला और बेहतर मार्गदर्शन के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे शिक्षक प्रशासनिक सांठगांठ का फायदा उठाकर अटैचमेंट का आनंद ले रहे हैं। बिना पढ़ाए और बिना विद्यालय गए वेतन उठाना सीधे तौर पर शासकीय धन का गबन और वित्तीय भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। शिकायत कर्ता ने मांग की है कि इस पूरे मामले में जिला शिक्षा केन्द्र के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और वित्तीय अनियमितताओं की उच्च स्तरीय जांच की जानी चाहिए।
शिकायत कर्ता ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि संतोष कुमार तिवारी की वर्ष 2006 से लेकर 2026 तक की समस्त पदस्थापनाओं, परिवीक्षा अवधि, संलग्नीकरण, फर्जी उपस्थिति के आधार पर आहरित वेतन तथा संकुल प्राचार्य द्वारा दी गई स्वीकृति की निष्पक्ष जांच कराई जाए। दोषी पाए जाने पर अवैध रूप से दिए गए वेतन की वसूली की जाए और शासकीय नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले अधिकारियों व शिक्षक पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर संलग्नीकरण तुरंत समाप्त किया जाए।

इनका कहना है
संतोष तिवारी को नियमित क्लास लेनी चाहिए उसके बाद जिला शिक्षा केंद्र का कार्य करना चाहिए और पोर्टल पर उपस्थित भी लगानी चाहिए यह प्राचार्य को देखना चाहिए।
शिरीष श्रीवास्तव,बीईओ, जैतहरी