विकास के दावों पर डामर की झोल: पहली ही बारिश में बही करोड़ों की उम्मीदें

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अनूपपुर। जनजातीय बहुल बैगा अंचल को विकास की मुख्यधारा में लाने का ढोल पीटने वाली सरकारी मशीनरी की कलाई पहली ही बारिश में खुल गई है। अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ में ‘प्रधानमंत्री जनमन ग्राम सड़क योजना’ के तहत बनाई गई कोहका–गर्जनबीजा सड़क आज व्यवस्था के गाल पर एक तमाचा बनकर खड़ी है। महज चार महीने पहले करोड़ों की लागत से तैयार हुई सड़क अब हाथों से उखड़ रही है। यह महज एक सड़क का टूटना नहीं, बल्कि उस सोच की नाकामी है जो कागजों में तो आदिवासी कल्याण का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन धरातल पर भ्रष्टाचार की डामर बिछाती है।

​3 करोड़ 1 लाख 16 हजार रुपये की भारी-भरकम राशि से बनी यह सड़क गुणवत्ता के नाम पर एक भद्दा मजाक साबित हो रही है। ठेकेदार, कंसल्टेंसी और सरकारी एजेंसियों के गठजोड़ ने मिलकर बैगा समुदाय के भरोसे को छलने का काम किया है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई और मानकों की धज्जियां उड़ा दी गईं। नतीजा यह है कि सड़क उद्घाटन के चंद महीनों बाद ही हादसों को न्योता देती बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी है।
​इस पूरे प्रकरण ने निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। पहली ही बारिश में उखड़ी डामर और धंसी हुई पुलियाएं चिल्ला-चिल्लाकर कह रही हैं कि यहाँ निगरानी नहीं, बल्कि मिलीभगत का खेल खेला गया है। क्या बैगा आदिवासियों के विकास के लिए आया पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा या शासन-प्रशासन इस नाकामी के जिम्मेदारों पर कड़ा प्रहार करेगा?



​ करोड़ों की लागत, फिर भी चार महीने में दम तोड़ गई सड़क
सरकारी फाइलों में अनूपपुर जिले की 5.30 किलोमीटर लंबी कोहका–गर्जनबीजा सड़क को नवनिर्मित और पूरी तरह क्रियाशील दर्ज किया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह सड़क चार महीनों के भीतर ही बरसों पुरानी और जर्जर दिखने लगी है। 3 करोड़ 1 लाख 16 हजार रुपये की भारी-भरकम बजट वाली यह परियोजना पहली ही बारिश का थपेड़ा सहन नहीं कर पाई। सड़क पर जगह-जगह आई दरारें और उधड़ती सतह साफ इशारा कर रही हैं कि निर्माण में मानकों को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया था।

उखड़ती डामर और घटिया सामग्री: हाथ लगाते ही बिखर रही परत
सड़क निर्माण की गुणवत्ता का आलम यह है कि डामर की परत हाथों से छूते ही उखड़ रही है। स्थानीय बैगा समुदाय का आरोप है कि ठेकेदार ने घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल कर सिर्फ कागजी औपचारिकता पूरी की है। तस्वीरों और मौके के हालात से साफ जाहिर होता है कि तकनीकी मानकों की जमकर अनदेखी की गई। ठेकेदार ने जिस गुणवत्ता का दावा किया था, उसकी पोल खुद सड़क की बिखरती हुई परतें खोल रही हैं।

पुलियाओं का निर्माण भी पहली बारिश में हुआ पस्त
सड़क ही नहीं, बल्कि इस मार्ग पर बनाई गई पुलियाएं और किनारे भी पहली बारिश में पूरी तरह जवाब दे गए। कई जगहों पर कटाव होने से सड़क का बड़ा हिस्सा बह गया है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका काफी बढ़ गई है। पुलियाओं का कमजोर निर्माण यह दर्शाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती पर ज़रा सा भी ध्यान नहीं दिया गया। अगर पहली बारिश में यह हाल है, तो आने वाले मानसून में यह मार्ग पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुँच जाएगा।

. जिम्मेदारों की त्रिमूर्ति और ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ का खेल
इस पूरे निर्माण कार्य की जिम्मेदारी मेसर्स जय माता दी कंस्ट्रक्शन बुढ़ार के पास थी, जबकि निगरानी का काम कंसल्टेंसी मेसर्स परी इंजीनियरिंग एसोसिएट सिवनी और निष्पादन एजेंसी मध्यप्रदेश ग्रामीण सड़क प्राधिकरण को सौंपा गया था। निगरानी और क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार इन संस्थाओं की मौन सहमति के बिना ऐसा घटिया निर्माण संभव ही नहीं था। इस त्रिमूर्ति के रवैये ने स्थानीय लोगों के बीच ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर दिया है।

बैगा समुदाय में गहराता आक्रोश और ठगे जाने का अहसास
विशेष रूप से बैगा अंचल को ध्यान में रखकर शुरू की गई इस योजना की ऐसी दुर्गति ने आदिवासियों के गुस्से को भड़का दिया है। जिस सड़क को उनके जीवन को सुगम बनाने के लिए बनाया गया था, वह अब उनके लिए मुसीबत का सबब बन चुकी है। बैगा समुदाय खुद को प्रधानमंत्री जनमन योजना के नाम पर ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जब-जब सरकारी मशीनरी इस तरह का घटिया काम करती है, तब-तब आदिवासियों का व्यवस्था पर से विश्वास पूरी तरह डगमगा जाता है।

जनजातीय विकास योजनाओं की विश्वसनीयता पर उठते संगीन सवाल
यह मामला सिर्फ एक खराब सड़क का नहीं है, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए चलाए जा रहे अभियानों की साख पर भी एक बड़ा सवाल है। अगर अति-संवेदनशील और पिछड़े क्षेत्रों में भी बिना किसी जवाबदेही के ऐसा घटिया निर्माण होता रहेगा, तो योजनाओं के क्रियान्वयन की मंशा पर सवाल उठना तय है। क्या विकास की परिभाषा सिर्फ बजट मंजूर करना और घटिया निर्माण कर हाथ खींच लेना भर रह गया है?

जांच का दिखावा या होगी कठोर कार्रवाई? प्रशासन पर टिकीं निगाहें
अब पूरे अंचल की निगाहें जिला प्रशासन और मध्यप्रदेश ग्रामीण सड़क प्राधिकरण के शीर्ष अधिकारियों पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या ठेकेदार, कंसल्टेंसी और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह जांच की फाइलों में दबकर रह जाएगा? जब तक ठेकेदार से वसूली, ब्लैकलिस्टिंग और अधिकारियों पर निलंबन की कार्रवाई नहीं होती, तब तक जनता को न्याय मिलने की उम्मीद बेमानी है।
इनका कहना है
काम अभी प्रगति पर है जो पैच खराब हुआ है वहां पर कंक्रीट वर्क कराया जा रहा है
दीपेश रावल, महाप्रबंधक
मध्यप्रदेश ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण अनुपपुर