अनूपपुर में ‘विनाशकारी विकास’ की आहट,
टोरंट पावर प्लांट की बलि चढ़ेगी सोन नदी और हज़ारों ग्रामीणों का भविष्य
अनूपपुर। पं अजय मिश्र। प्रगति और औद्योगिकीकरण की चकाचौंध के बीच अनूपपुर जिले के वनांचल क्षेत्रों में एक गहरा सन्नाटा और डर व्याप्त है। टोरंट पावर (पूर्व में न्यू जोन इंडिया) द्वारा फुनगा उसके क्षेत्र के पास लगाए जा रहे 1,600 मेगावाट के विशाल थर्मल पावर प्लांट को प्रशासन भले ही ‘रोजगार की चाबी’ बता रहा हो, लेकिन धरातल पर यह हजारों परिवारों के लिए विस्थापन का दंश और पर्यावरण के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसा नजर आ रहा है।
सोन-केवई के अस्तित्व पर मंडराता संकट
इस परियोजना की सबसे बड़ी मार जीवनदायिनी सोन और केवई नदियों पर पड़ने वाली है। 1,600 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए लाखों गैलन पानी की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि नदियों से इस भारी जल दोहन के कारण गर्मियों में नदियाँ पूरी तरह सूख जाएंगी, जिससे किनारे बसे सैकड़ों गांवों में पीने के पानी का अकाल पड़ जाएगा। प्लांट से निकलने वाला जहरीला गर्म पानी जब वापस नदियों में मिलेगा, तो जलीय जीवन पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
’राख के ढेर’ में दबेगी खेती और सांसें
क्षेत्र में पहले से ही बिजली संयंत्रों का जाल बिछा हुआ है। अनूपपुर और शहडोल जिले के लोग पहले ही फ्लाई ऐश (कोयले की राख) की समस्या से जूझ रहे हैं। टोरंट प्लांट के आने से हवा में ‘पार्टिकुलेट मैटर’ (PM 2.5 और PM 10) की मात्रा जानलेवा स्तर तक पहुंच जाएगी।
स्वास्थ्य का खतरा: राख के सूक्ष्म कण लोगों के फेफड़ों में जमा होकर दमा, टीबी और कैंसर जैसी बीमारियां पैदा करेंगे।
बंजर होती जमीन: हवा में उड़ती राख खेतों पर जम जाएगी, जिससे फसलों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया रुक जाएगी और आने वाले दशकों में यहां की उपजाऊ मिट्टी कंक्रीट जैसी बंजर हो जाएगी।
विस्थापन: जमीन छिनी, पर रोजगार का वादा ‘हवाई’
लगभग 922 एकड़ भूमि पर प्रस्तावित इस प्रोजेक्ट ने किसानों को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। प्रभावित ग्रामीण राम अवतार (नाम परिवर्तित) का कहना है, “हमें चंद रुपयों का लालच देकर हमारी मां (जमीन) छीन ली गई। अब हम न खेती के लायक बचे हैं और न ही कंपनी हमें अच्छी नौकरी देगी, क्योंकि हमारे पास वैसी डिग्री नहीं है।” इतिहास गवाह है कि बड़े प्रोजेक्ट्स में स्थानीय लोगों को केवल ‘सुरक्षा गार्ड’ या ‘मजदूर’ की श्रेणी में रखा जाता है, जबकि मुख्य लाभ बाहरी लोग उठाते हैं।
जैव विविधता और वन्यजीव गलियारे का विनाश
यह क्षेत्र हाथियों और बाघों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। प्लांट के भारी शोर, ऊंची चिमनियों से निकलते धुएं और रात की तेज रोशनी से वन्यजीवों का प्राकृतिक मार्ग बाधित होगा। इससे आने वाले समय में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं और बढ़ेंगी, जिसका खामियाजा निर्दोष ग्रामीणों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ेगा।
स्थानीय विरोध और अनसुनी चीखें
कई बार ग्राम सभाओं में विरोध के बावजूद कॉर्पोरेट और प्रशासन के गठजोड़ के आगे ग्रामीणों की आवाज दबा दी जाती है। ‘न्यू जोन’ के नाम से शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट अब ‘टोरंट’ के हाथों में है, लेकिन स्थानीय लोगों की समस्याओं का समाधान किसी के पास नहीं है।
”क्या हम बिजली के बदले अपनी आने वाली पीढ़ियों को जहरीली हवा और सूखा भविष्य देने जा रहे हैं? सरकार को इस परियोजना पर फिर से विचार करना चाहिए।”








