14 साल बाद जागा ‘न्यू जोन’ (टोरंट पावर) का भूत

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किसानों की जमीन पर संकट और प्रशासन की ‘रेड कार्पेट’ तैयारी

14 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद अचानक सक्रिय हुआ ‘न्यू जोन’ प्रोजेक्ट।
​किसानों ने लगाया डराने-धमकाने और जबरन कब्जे का आरोप।
​पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश और दहशत।
​स्थानीय राजनीति ने साधी चुप्पी, प्रशासन पर मिलीभगत के आरोप।
​क्या है पूरा मामला?
अनूपपुर। इलाके में 14 साल पहले एक विशेष ‘न्यू जोन’ परियोजना की नींव रखी गई थी, जो सालों तक ठंडे बस्ते में रही। अचानक, इस ‘भूत’ ने फिर से सिर उठा लिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि भू-माफिया और संबंधित कंपनियों के कारिंदे अब किसानों की पुश्तैनी जमीनों पर कब्जा करने के लिए डराने-धमकाने का सहारा ले रहे हैं।
​जिस जमीन पर किसान सालों से हल चला रहे थे, वहां अब रातों-रात बाड़बंदी करने और पत्थर गाड़ने की कोशिशें की जा रही हैं। किसानों का कहना है कि उनकी सहमति के बिना और पुराने कागजों का हवाला देकर उन्हें बेदखल किया जा रहा है।

दहशत के साए में ‘पर्यावरणीय जनसुनवाई’

​प्रशासन ने इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय जनसुनवाई (Environmental Public Hearing) की तारीख तय कर दी है। आमतौर पर यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, लेकिन ग्रामीणों में इस समय दहशत का माहौल है।

​ग्रामीणों का तर्क: जब हमें अपनी जमीन का मालिकाना हक खोने के बाद मिलने वाली सुविधाएं ही नहीं मिल रही, तो पर्यावरण की चिंता बाद की बात है।

​दबाव का आरोप: ग्रामीणों का कहना है कि जनसुनवाई के नाम पर भारी बल तैनात कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।

प्रशासन ने बिछाई ‘रेड कार्पेट’
​एक तरफ जहाँ ग्रामीण दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, वहीं प्रशासन का रुख पूरी तरह से उद्योगपतियों और प्रोजेक्ट के पक्ष में नजर आ रहा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन ने प्रोजेक्ट के संचालकों के लिए ‘रेड कार्पेट’ बिछा दी है। कागजी औपचारिकताएं आनन-फानन में पूरी की जा रही हैं और किसानों की आपत्तियों को दरकिनार किया जा रहा है।

​”हम अपनी जान दे देंगे, लेकिन अपनी पुश्तैनी जमीन नहीं देंगे। प्रशासन हमारी सुनने के बजाय कंपनी के नुमाइंदों की तरह व्यवहार कर रहा है।” — एक पीड़ित किसान

राजनीति की ‘खामोशी’ ने खड़े किए सवाल

​इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात स्थानीय राजनीति की चुप्पी है। चुनाव के समय किसानों के मसीहा बनने वाले नेता अब ‘खामोशी की चादर’ ओढ़कर बैठ गए हैं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी भी बड़े चेहरे ने किसानों के पक्ष में खुलकर आवाज नहीं उठाई है। इस चुप्पी को ग्रामीण एक बड़े राजनीतिक षड्यंत्र के रूप में देख रहे हैं।

आगे क्या?
​आगामी जनसुनवाई में भारी हंगामे के आसार हैं। यदि प्रशासन और सरकार ने समय रहते किसानों से संवाद नहीं किया और उनकी आशंकाओं को दूर नहीं किया, तो यह मामला एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।