सीएम राइज स्कूल का निर्माण बना ‘सफेद हाथी’: उद्घाटन से पहले ही दरकने लगीं दीवारें, नन्हे छात्रों की सुरक्षा पर मंडराया खतरा
पं अजय मिश्र
बदरा (अनूपपुर):मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी सीएम राइज’ स्कूल परियोजना जिसका उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाना था, आज बदरा क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। सांदीपनि विद्यालय के नाम से बन रहे इस आलीशान भवन की भव्यता के नीचे जो निर्माण कार्य छिपा है, उसकी कलई उद्घाटन से पहले ही खुल गई है। अभी फीता काटना तो दूर, भवन को पूरी तरह से हैंडओवर भी नहीं किया गया है, लेकिन दीवारों में पड़ी दरारें चीख-चीख कर निर्माण में बरती गई अनियमितताओं की कहानी बयां कर रही हैं।
यह महज दीवारों का दरकना नहीं, बल्कि उन दावों का दरकना है जो सरकार ने बेहतर शिक्षा के बुनियादी ढांचे के लिए किए थे। करोड़ों रुपये की सरकारी राशि पानी की तरह बहाकर तैयार किया जा रहा यह भवन यदि अभी से अपनी उम्र हारने लगा है, तो यह स्पष्ट है कि निर्माण सामग्री के चयन में भारी धांधली की गई है। सवाल यह है कि आखिर किसकी शह पर ठेकेदार ने इतनी बड़ी लापरवाही की? क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदकर कमीशनखोरी में व्यस्त थे, या फिर निर्माण की निगरानी करना ही मुनासिब नहीं समझा गया?
सुरक्षा के नाम पर बड़ा खिलवाड़:
बदरा स्थित सीएम राइज (सांदीपनि) विद्यालय में कक्षा 1 से लेकर 12वीं तक के हजारों छात्र अपना भविष्य संवारने आएंगे। लेकिन, जिस नींव पर उनका भविष्य खड़ा होना है, वह नींव ही असुरक्षित दिखाई दे रही है। उद्घाटन से पहले ही दीवारों का दरकना किसी बड़े हादसे का पूर्व संकेत हो सकता है, जिससे अभिभावकों में भारी आक्रोश है।
करोड़ों का बजट और घटिया सामग्री:
इस परियोजना के लिए सरकार ने करोड़ों रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया था ताकि अत्याधुनिक सुविधाएं मिल सकें। लेकिन धरातल पर जो काम हुआ है, वह सरकारी धन की बर्बादी का जीता-जागता उदाहरण है। गुणवत्ता के मानक यहां पूरी तरह नदारद दिखे, जिससे यह साफ होता है कि बजट का बड़ा हिस्सा निर्माण सामग्री के बजाय ठेकेदार की जेब में चला गया।
दो साल की मेहनत पर पानी:
इस भवन का निर्माण कार्य लगभग दो साल पहले शुरू हुआ था। इतनी लंबी अवधि में भी यदि काम अधूरा और दोषपूर्ण है, तो यह ठेकेदार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। निर्माण कार्यों में इतनी सुस्ती और उसके बाद भी ऐसी निम्न गुणवत्ता, प्रशासनिक अक्षमता को प्रदर्शित करती है।
ठेकेदार की मनमानी का बोलबाला:
स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि पूरे निर्माण कार्य के दौरान ठेकेदार ने अपनी मनमर्जी चलाई। न तो मानकों का पालन किया गया और न ही तकनीकी विशेषज्ञों की सलाह ली गई। विभाग के इंजीनियरों ने भी समय-समय पर साइट का दौरा करना उचित नहीं समझा, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।
अधिकारी मौन, सवाल बेजा:
इतनी गंभीर अनियमितता सामने आने के बाद भी संबंधित विभाग के अधिकारी फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी न केवल संदिग्ध है, बल्कि मिलीभगत की ओर भी इशारा करती है। जब भ्रष्टाचार के स्पष्ट प्रमाण सामने हैं, तो अब तक कोई आधिकारिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
जांच की मांग पर अडिग ग्रामीण:
अभिभावकों और प्रबुद्ध नागरिकों ने जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच की मांग की है। वे चाहते हैं कि न केवल निर्माण की गुणवत्ता की जांच हो, बल्कि इस पूरे खेल में शामिल अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत का भी पर्दाफाश हो।ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यदि सरकार स्कूल को सुरक्षित घोषित नहीं करती है, तो वे अपने बच्चों को यहां भेजने का जोखिम बिल्कुल नहीं उठाएंगे। शिक्षा का अधिकार सुरक्षा के अधिकार के बाद आता है, और इस मामले में कोई भी कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
क्या सुधरेगी व्यवस्था?
अनूपपुर जिले की यह घटना पूरे शिक्षा विभाग के लिए एक आईना है। यदि अभी समय रहते दोषी पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे ही भ्रष्टाचार से निर्मित अन्य भवनों की भी यही दुर्गति होगी। लोगों की निगाहें अब कलेक्टर की ओर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या कदम उठाते हैं।
जवाबदेही तय करना जरूरी:
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े चेहरे को बचाते हुए मामले को रफा-दफा करता है, या फिर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का नजीर पेश करता है। शिक्षा के मंदिर की पवित्रता और मजबूती बनाए रखने के लिए अब निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है।
ठेकेदार और पीआईयू (PIU) विभाग की मिलीभगत: भ्रष्टाचार का नापाक गठबंधन
इस पूरे भ्रष्टाचार की जड़ में ठेकेदार और लोक निर्माण विभाग (PIU) की मिलीभगत का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि ठेकेदार और पीआईयू के जिम्मेदार अधिकारियों का ‘गठजोड़’ जिले में चल रहे निर्माण कार्यों के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ बन गई है। पीआईयू के अधिकारी न केवल निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की अनदेखी कर रहे हैं, बल्कि तकनीकी खामियों को भी नजरअंदाज कर रहे हैं, जिसके बदले उन्हें मोटी कमीशनखोरी का लाभ मिलता है। इन दोनों की सरपरस्ती में ही सरकारी खजाने की बंदरबांट हो रही है, जिससे जिले में निर्माण कार्य केवल कागजों पर ‘अत्याधुनिक’ दिखाई देते हैं, जबकि धरातल पर वे भ्रष्टाचार की ईंटों से खड़े किए जा रहे हैं प्रशासनिक अधिकारियों की मौन सहमति और लापरवाही के बिना इतना बड़ा भ्रष्टाचार संभव ही नहीं है।
जब निर्माण कार्य के दौरान पीआईयू (PIU) के इंजीनियर और तकनीकी पर्यवेक्षक निरंतर निरीक्षण नहीं करते, तो यह उनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष मिलीभगत को दर्शाता है।
परियोजनाओं में ‘गुणवत्ता नियंत्रण’ के सख्त मानक होते हैं। यदि उन मानकों को दरकिनार करके निर्माण जारी रहता है, तो यह स्पष्ट है कि उच्च स्तर तक कहीं न कहीं ‘मैनेजमेंट किया गया है।जब तक संबंधित विभाग के उच्च अधिकारी ठेकेदारों पर कार्रवाई नहीं करेंगे, तब तक यह चक्र चलता रहेगा। ऐसे मामलों में प्रायः यह देखा गया है कि ‘अधिकारी-ठेकेदार-नेता’ का त्रिकोण जनहित के कार्यों को निजी लाभ का जरिया बना लेता है।
प्रशासनिक अधिकारियों की यह चुप्पी, साक्ष्यों के सामने होने के बावजूद भी कोई कार्रवाई न करना, इस बात की पुष्टि करता है कि सिस्टम के भीतर ही ऐसे भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण प्राप्त है। बिना उच्च-स्तरीय प्रशासनिक इच्छाशक्ति और निष्पक्ष जांच के, इस भ्रष्टाचार के जाल को भेदना लगभग असंभव है।






