सदर गब्बर भाई पर इल्ज़ामात को बताया साज़िश का सुनियोजित हिस्सा
देपालपुर। संदीप सेन। देपालपुर और हसनाबाद की अवाम ने एक जोरदार और दस्तावेज़ी बयान जारी करते हुए हालिया अखबारों में शाया खबरों को “इफ्तिरा, दुष्प्रचार और सुनियोजित साज़िश” करार दिया है। बयान में कहा गया कि यह मामला महज़ किसी शख्सियत के खिलाफ आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी कौम की इज़्ज़त, वक्फ़ अमानत और दीनी इदारों की साख को निशाना बनाने की कोशिश है। अवाम ने स्पष्ट किया कि सदर गब्बर भाई (सलीम साहब) के खिलाफ लगाए गए तमाम इल्ज़ामात न सिर्फ बेबुनियाद हैं बल्कि पूर्वनियोजित रणनीति के तहत गढ़े गए हैं।
वक्फ़ अमानत और मिल्कियत का तथ्यात्मक पक्ष
समाज के जिम्मेदार अफ़राद ने तकनीकी तौर पर स्पष्ट किया कि जिस खानदान के अस्लाफ़ ने 25 से 30 बीघा जमीन अल्लाह की राह में वक्फ़ की हो, और जिसका रिकार्ड स्थानीय दस्तावेजों में दर्ज हो, उस परिवार पर मस्जिद की जमीन पर “कब्ज़ा” करने का आरोप तर्क और तथ्यों से परे है। हाल ही में ईदगाह के लिए अपनी बहुमूल्य निजी जमीन दान देना इस बात का प्रमाण है कि गब्बर भाई का परिवार वक्फ़ अमानत को निजी स्वार्थ से ऊपर रखता आया है। बयान में कहा गया कि यदि किसी के पास दस्तावेजी प्रमाण हैं तो वे सार्वजनिक मंच पर पेश किए जाएं, अन्यथा आवाम को गुमराह करने की कोशिश बंद की जाए।
मिम्बर का सियासी इस्तेमाल और रिकॉर्डिंग्स का दावा
बयान में गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि मस्जिद के मिम्बर जैसे मुकद्दस मकाम का इस्तेमाल निजी सियासत और अफवाहबाज़ी के लिए किया गया। अवाम ने दावा किया कि संबंधित बयानों की रिकॉर्डिंग्स और ऑडियो साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे यह साबित होता है कि काज़ी नियुक्ति का मामला एक महीने पूर्व से ज्ञात था। इसके बावजूद “आवाम के सामने अचानक विवाद” का नैरेटिव गढ़ा गया, जिससे माहौल में बेवजह तनाव पैदा किया गया।
काज़ी नियुक्ति: प्रक्रिया, सहमति और वैधता
वर्तमान काज़ी सैयद अता हुसैन की ताय्युनाती को लेकर स्पष्ट किया गया कि यह फैसला देपालपुर व हातोद तहसील की लगभग 70 प्रतिशत आवाम, मुख्तलिफ गांवों के सदरों, कमेटियों और जिम्मेदार उलेमा की रज़ामंदी से हुआ। बयान में यह भी कहा गया कि बरेली शरीफ के मुफ़्ती इम्तियाज़ साहब, मुफ़्ती मालवा नूरुल हक साहब, मुफ़्ती साबिर अली साहब, शहर काज़ी इशरत अली साहब तथा मुख्य सांवेर शहर काज़ी सलामुद्दीन साहब की मशविरा व तस्दीक के बाद ही नियुक्ति को अमली जामा पहनाया गया।
अवाम ने सवाल उठाया कि पूर्व में नोसे मियां की मौजूदगी में सीमित लोगों द्वारा की गई नियुक्ति पर उस समय आपत्ति क्यों नहीं की गई, और आज जब व्यापक सहमति से फैसला हुआ तो उसे विवादित क्यों बताया जा रहा है?
आर्थिक अनियमितताओं पर खामोशी का आरोप
बयान में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ अफ़राद सूद (ब्याज) और नाजायज आर्थिक गतिविधियों पर खामोश रहकर केवल अपनी कुर्सी और व्यक्तिगत हितों की हिफाजत में लगे हैं। अखबारों में “आधे-अधूरे तथ्यों” के आधार पर खबरें शाया कर आवाम को भड़काने की कोशिश की जा रही है। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह तरीका दीनी और सामाजिक उसूलों के खिलाफ है।
कानूनी व सामाजिक कार्रवाई की चेतावनी
अवाम ने दो टूक कहा कि यदि झूठे आरोपों का सिलसिला बंद नहीं हुआ तो वे तमाम दस्तावेज, रिकॉर्डिंग्स और साक्ष्य सार्वजनिक मंच पर पेश करेंगे। साथ ही संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, मानहानि दावा और प्रशासनिक शिकायत जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
समाज ने मांग की कि कमेटी सार्वजनिक रूप से माफी मांगे और फितना फैलाने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में दीनी इदारों की गरिमा को ठेस न पहुंचे।
एकता और हक़ का पैगाम
बयान के अंत में देपालपुर और हसनाबाद की अवाम ने यह संदेश दिया कि कौम की एकता, अमानत और इंसाफ़ से कोई समझौता नहीं होगा। गब्बर भाई के खानदान की खिदमतों को “देने वाली रवायत” का प्रतीक बताते हुए कहा गया कि आवाम झूठे प्रोपेगैंडा के आगे झुकेगी नहीं। “अल्लाह हक़ और सच बोलने वालों का हामी व मददगार है।






