प्रशासनिक लापरवाही या उलझन का मकड़जाल: एक ही आदेश क्रमांक पर दो अलग-अलग गोपनीय प्रतिवेदन प्रपत्रों ने बढ़ाई शिक्षकों की मुश्किलें

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अनूपपुर। शिक्षा विभाग के दफ्तरों में लालफीताशाही और कागजी खानापूर्ति किस हद तक शिक्षकों के लिए मानसिक उत्पीड़न का सबब बन चुकी है, इसकी बानगी पुष्पराजगढ़ से सामने आई है। एक तरफ शासन-प्रशासन शिक्षकों को समय पर पटल के काम निपटाने की सख्त हिदायत देता है, वहीं दूसरी तरफ खुद जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा जारी किए जाने वाले आदेशों में ऐसा विरोधाभास और तकनीकी घालमेल परोसा जाता है, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे विधिक विशेषज्ञ भी चक्कर खा जाएं। जब एक ही आदेश क्रमांक और एक ही दिनांक के तहत दो अलग-अलग प्रकार के गोपनीय प्रतिवेदन और सूचियों के प्रपत्र थमा दिए जाएं, तो मैदानी स्तर पर बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक शिक्षा की अलख जगाए या फिर बाबुओं की इस अंतहीन कागजी भूलभुलैया से उलझकर अपना मानसिक संतुलन खोए।
यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लचर कार्यप्रणाली की पोल खोलती है, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यकुशलता पर भी सीधा प्रहार करती है जो बिना किसी समन्वय के ताबड़तोड़ तुगलकी फरमान जारी कर देते हैं। आखिर कैसे एक ही पत्र क्रमांक ‘शिक्षा-स्था./2026-27/3594’ और दिनांक 22 जुलाई 2026 के अंतर्गत शिक्षकों को अलग-अलग प्रारूपों और ब्योरों के चक्रव्यूह में उलझा दिया गया? क्या शिक्षा विभाग के पास अब योग्य और प्रशिक्षित कर्मचारियों का अकाल पड़ गया है जो एक सामान्य पदोन्नति प्रक्रिया जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए भी स्पष्ट और एकरूपी निर्देश जारी करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं? इस गंभीर प्रशासनिक खामियाजे का खामियाजा अंततः उन शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है जो पहले से ही शैक्षणिक दायित्वों के बोझ तले दबे हुए हैं।

असमंजस में शिक्षक और लचर प्रशासनिक व्यवस्था
कार्यालय विकास खंड शिक्षा अधिकारी पुष्पराजगढ़, जिला अनूपपुर (म.प्र.) द्वारा हाल ही में जारी किए गए एक आदेश ने क्षेत्र के शिक्षकों के बीच भारी असमंजस और आक्रोश की स्थिति पैदा कर दी है। सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग अनूपपुर से प्राप्त निर्देशों का हवाला देते हुए प्राथमिक, सहायक और माध्यमिक शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया के लिए विगत 08 वर्षों (2017-18 से 2024-25 तक) के गोपनीय प्रतिवेदन और अभिलेख उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इसी एक ही आदेश के साथ संलग्न प्रपत्रों में भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है, जिससे शिक्षक यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे कौन सा प्रपत्र भरें और किसे सही मानें।

एक ही आदेश क्रमांक, अलग-अलग दस्तावेज
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, विकास खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी पत्र क्रमांक 3594, दिनांक 22 जुलाई 2026 के तहत शिक्षकों को जो प्रारूप थमाए गए हैं, उनमें एक तरफ विस्तृत सारणीबद्ध जानकारी जिसमें लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू, विभागीय जांच और 8 वर्षों के मतांकन का ब्योरा मांगा गया है शामिल है, तो दूसरी तरफ पारंपरिक गोपनीय चरित्रावली का बहु-पृष्ठ प्रारूप संलग्न है जिसमें स्वमूल्यांकन और रिपोर्टिंग अधिकारी के मूल्यांकन के विभिन्न बिंदु दिए गए हैं। एक ही आदेश संख्या के अंतर्गत दो भिन्न प्रकार के फॉर्मेट सामने आने से संकुल प्राचार्यों और शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति बन गई है।

8 वर्षों का लेखा-जोखा और कागजी बोझ
पदोन्नति प्रक्रिया के नाम पर शिक्षकों से पिछले आठ वित्तीय वर्षों (2017-18 से 2024-25 तक) के गोपनीय प्रतिवेदन, स्नातक व स्नात्कोत्तर की अंकसूचियाँ, सेवा पुस्तिका के प्रथम व द्वितीय पृष्ठ की प्रमाणित छायाप्रतियाँ तथा प्रथम नियुक्ति आदेश तत्काल उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। मैदानी स्तर पर कार्यरत शिक्षकों का कहना है कि एक ही वर्ष में विभिन्न प्रकार के प्रपत्रों की मांग और उनमें भी विरोधाभासी कॉलम होने के कारण दस्तावेजों को तैयार करने में भारी कठिनाई हो रही है। कई शिक्षकों के पुराने वर्षों के प्रतिवेदन संधारित न होने की स्थिति में उन्हें अनवरत मानसिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

विभागीय जाँच और कानूनी प्रकरणों के कॉलम पर उलझन
जारी किए गए एक प्रारूप में कर्मचारियों के खिलाफ चल रही विभागीय जांच (नियम 14, नियम 16 क आदि), लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू और न्यायालयीन प्रकरणों की अद्यतन स्थिति को बेहद सूक्ष्मता से मांगा गया है। वहीं दूसरे प्रारूप में केवल सामान्य गोपनीय चरित्रावली और शैक्षणिक व सह-शैक्षणिक उपलब्धियों का जिक्र है। एक ही आदेश के साए में चल रहे इन दो अलग-अलग पैमानों के कारण शिक्षकों में इस बात को लेकर डर है कि यदि उन्होंने गलत प्रपत्र भरकर जमा कर दिया, तो भविष्य में उनकी पदोन्नति अटक सकती है या तकनीकी त्रुटि का हवाला देकर उनके कागजात खारिज किए जा सकते हैं।

उच्चाधिकारियों को प्रेषित प्रतियों और प्रशासनिक चुप्पी
इस आदेश की प्रतिलिपियां कलेक्टर अनूपपुर, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, संभागीय उपायुक्त जनजातीय कार्य विभाग शहडोल तथा सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग अनूपपुर को सूचिवद्ध रूप से प्रेषित की गई हैं। इतने उच्च स्तर पर प्रशासनिक मॉनिटरिंग होने के बावजूद जमीनी स्तर पर इस तरह की तकनीकी और प्रलेखीय चूक होना विभागीय समन्वय की पोल खोलता है। जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अब तक इस बात को लेकर कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है कि आखिर किस प्रपत्र को अंतिम माना जाए।

शिक्षकों का बढ़ता आक्रोश और मानसिक उत्पीड़न
शिक्षक संगठनों और मैदानी शिक्षकों का कहना है कि शिक्षा विभाग का मुख्य कार्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना होना चाहिए, लेकिन पूरा प्रशासनिक अमला शिक्षकों को सिर्फ कागजी कार्रवाई और फाइलों के मकड़जाल में उलझाए रखता है। एक ही आदेश क्रमांक पर अलग-अलग प्रपत्र थमाकर शिक्षकों का मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है। यदि समय रहते विभाग द्वारा इस भ्रम को दूर नहीं किया गया, तो शिक्षक इस आदेश के खिलाफ खुलकर विरोध प्रदर्शन करने को विवश होंगे।

समाधान की बजाय समस्याओं का सृजन
विकास खंड स्तर पर इस तरह की त्रुटियां यह साबित करती हैं कि कार्यालयीन कार्यों में किस हद तक लापरवाही बरती जा रही है। एक तरफ शासन प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बनाने के दावे करता है, वहीं दूसरी तरफ पुष्पराजगढ़ बीईओ कार्यालय के ऐसे आदेश शासन की मंशा पर पानी फेर रहे हैं। शिक्षकों की मांग है कि विभाग तुरंत एक संशोधित और स्पष्ट आदेश जारी करे जिसमें केवल एक ही प्राधिकृत प्रपत्र का जिक्र हो, ताकि असमंजस की स्थिति हमेशा के लिए समाप्त हो सके।

कार्यालय में जमे निजी बाबू की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
​इन तमाम प्रशासनिक अनियमिताओं के बीच विकास खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में एक प्राइवेट बाबू ‘सोनू’ की सक्रियता और उसका दबदबा सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है। उल्लेखनीय है कि इसी व्यक्ति को पूर्व में जिले के तत्कालीन कलेक्टर द्वारा गंभीर वित्तीय गड़बड़ियों और शिकायतों के चलते कार्यालय से हटा दिया गया था, ताकि कार्यालय की साख और प्रशासनिक पारदर्शिता बनी रहे। सवाल यह उठता है कि आखिर किस रसूखदार अधिकारी की शह पर उस दागी प्राइवेट बाबू की दोबारा पुष्पराजगढ़ बीईओ कार्यालय में एंट्री हुई और वह पर्दे के पीछे से किसके इशारे पर अवैध वसूली का सिंडिकेट चला रहा है? जब ऐसे संदेहास्पद और सेवा से हटाए गए लोग कार्यालय के सर्वेसर्वा बनकर फाइलें घुमाएंगे, तो भला शिक्षकों के वैध और पारदर्शी कार्य निष्पक्ष तरीके से कैसे संभव हो सकेंगे।