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गर बैठक हुई तो वर्षों का रिकॉर्ड जनता और पत्रकारों के सामने रखे ट्रस्ट
प्रशासन और ट्रस्ट पर बढ़ा पारदर्शिता का दबाव
अनूपपुर। अमरकंटक स्थित मां नर्मदा मंदिर ट्रस्ट एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। ट्रस्ट की आय-व्यय, करोड़ों रुपये के चढ़ावे और संपत्तियों का सार्वजनिक लेखा-जोखा मांगने वाले पुष्पराजगढ़ विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को ने अब प्रस्तावित ट्रस्ट बैठक को लेकर नया मोर्चा खोल दिया है। पत्र और वीडियो संदेश जारी कर उन्होंने मांग की है कि बैठक से पहले ट्रस्ट गठन से अब तक का पूरा वित्तीय रिकॉर्ड जनता और मीडिया के सामने रखा जाए। इस मांग ने प्रशासन और ट्रस्ट की जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
मां नर्मदा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं और इसी आस्था के संरक्षण की जिम्मेदारी मां नर्मदा मंदिर ट्रस्ट पर है। लेकिन जब किसी धार्मिक ट्रस्ट की वित्तीय पारदर्शिता, निर्णय प्रक्रिया और सार्वजनिक जवाबदेही पर लगातार सवाल उठने लगें, तब मामला केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता बल्कि जनविश्वास से जुड़ जाता है। राम मंदिर चंदा चोरी प्रकरण के बाद पहले ही ट्रस्ट की कार्यप्रणाली चर्चा में थी। इसी बीच विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को ने ट्रस्ट की वर्षों की आय-व्यय, सोना-चांदी, चल-अचल संपत्तियों और विकास कार्यों का सार्वजनिक विवरण मांगकर बहस को नया आयाम दे दिया है। अब बैठक की तिथि बदलने की मांग और वीडियो संदेश में रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की अपील ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। सवाल यह नहीं कि बैठक कब होगी, बल्कि यह है कि क्या ट्रस्ट जनता के सामने अपने वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड रखने को तैयार है।
बैठक से पहले नया सियासी और प्रशासनिक मोड़
मां नर्मदा मंदिर ट्रस्ट की बैठक पहले 15 जुलाई को प्रस्तावित थी, जिसे बाद में 18 जुलाई के लिए निर्धारित किया गया। अब विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को ने कलेक्टर को पत्र लिखकर बैठक की तिथि फिर बदलने का अनुरोध किया है। उनका कहना है कि विधानसभा और लोकसभा का मानसून सत्र शुरू होने से जनप्रतिनिधि व्यस्त रहेंगे, इसलिए ऐसी तिथि तय की जाए जिसमें सभी सदस्य उपस्थित होकर इस गंभीर विषयों पर व्यापक चर्चा कर सकें। इसके साथ ही उन्होंने वीडियो जारी कर स्पष्ट कहा कि यदि बैठक 18 जुलाई को होती है तो ट्रस्ट का पूरा रिकॉर्ड पत्रकारों और जनता के समक्ष सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
करोड़ों के चढ़ावे का हिसाब आखिर सार्वजनिक क्यों नहीं?
विधायक की सबसे बड़ी मांग ट्रस्ट की वित्तीय पारदर्शिता को लेकर है। उनका कहना है कि ट्रस्ट के गठन से लेकर आज तक मंदिर में आए चढ़ावे, सोना-चांदी, नकद दान, चल-अचल संपत्तियों और विकास कार्यों पर हुए खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। उनका तर्क है कि श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान सार्वजनिक विश्वास की पूंजी है और उसका हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए। इससे न केवल भ्रम दूर होगा बल्कि ट्रस्ट की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में
मामला केवल ट्रस्ट तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशासन की भूमिका भी चर्चा का विषय बन गई है। ट्रस्ट की बैठकों का संचालन प्रशासनिक निगरानी में होता है, ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जनता द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब भी प्रशासनिक स्तर पर मिले। यदि रिकॉर्ड उपलब्ध हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में देरी क्यों हो रही है? यही प्रश्न अब स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बन गया है। पारदर्शिता सुनिश्चित करना प्रशासन की भी जिम्मेदारी मानी जा रही है।
विकास कार्यों पर उठे गंभीर प्रश्न
विधायक का कहना है कि यदि ट्रस्ट आर्थिक रूप से इतना सक्षम है तो अमरकंटक में श्रद्धालुओं को अब भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है। स्वच्छता, पेयजल, पार्किंग, यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधाएं और अन्य विकास कार्य अपेक्षित स्तर पर क्यों नहीं दिखाई देते है? उनका मानना है कि यदि विकास कार्यों और खर्च का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक होगा तो वास्तविक स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी और अनावश्यक विवाद भी समाप्त होंगे।
पारदर्शिता ही विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा
अब पूरा मामला बैठक की तारीख से आगे बढ़कर जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है। विधायक ने साफ कहा है कि यदि ट्रस्ट के पास छिपाने जैसा कुछ नहीं है तो वर्षों का रिकॉर्ड जनता और पत्रकारों के सामने रखा जाए। दूसरी ओर अब निगाहें प्रशासन, ट्रस्ट प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इन मांगों पर क्या निर्णय लेते हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ट्रस्ट केवल बैठक कर औपचारिकता निभाता है या फिर सार्वजनिक विश्वास को मजबूत करने के लिए अपने वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड भी सामने रखता है।






