लोकतंत्र की धज्जी उड़ाता जिला प्रशासन: अविश्वास प्रस्ताव दबाने के खिलाफ अनूपपुर में फूटा जनाक्रोश, धरने पर बैठे जनपद सदस्य
अनूपपुर अनूपपुर जिला प्रशासन की घोर प्रशासनिक शिथिलता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखने की मनमानी नीति के खिलाफ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का सब्र का बांध टूट गया, जिसके विरोध में लगभग 13 जनपद सदस्यों ने कलेक्ट्रेट परिसर के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जनपद पंचायत अनूपपुर के अध्यक्ष के खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव को वैधानिक समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी ठंडे बस्ते में डाले रखने से आक्रोशित सदस्यों ने अब प्रशासन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
विवाद की जड़ें बीते 11 मई 2026 को दर्ज की गई उस शिकायत से जुड़ी हैं, जब जनपद पंचायत अनूपपुर के बहुसंख्यक निर्वाचित सदस्यों ने वर्तमान अध्यक्ष की कार्यप्रणाली और उनके प्रति अविश्वास जताते हुए मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 28 के तहत एक बकायदा लिखित नोटिस कलेक्टर एवं विहित प्राधिकारी के समक्ष पेश किया था। इस नोटिस में अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए पर्याप्त कानूनी बहुमत और सभी असंतुष्ट सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद थे, जिसकी अधिकारिक पावती भी सदस्यों को दी गई थी।
कानूनी और वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, मध्य प्रदेश पंचायत नियम (जनपद पंचायत तथा जिला पंचायत के अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव) के अंतर्गत विहित प्राधिकारी अथवा कलेक्टर को ऐसा कोई भी आधिकारिक अविश्वास प्रस्ताव नोटिस प्राप्त होने के ठीक 15 दिनों के भीतर एक विशेष बैठक बुलाना पूरी तरह अनिवार्य और बाध्यकारी होता है। नियत समय-सीमा का यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि स्थानीय निकायों में लोकतांत्रिक शुचिता बनी रहे और किसी भी प्रकार की हॉर्स-ट्रेडिंग या प्रशासनिक दुरुपयोग की गुंजाइश न बचे।
परंतु, बेहद क्षोभ और प्रशासनिक विफलता का विषय यह है कि 25 मई 2026 को कानून द्वारा निर्धारित वह महत्वपूर्ण 15 दिनों की अनिवार्य समयावधि पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, लेकिन कलेक्ट्रेट प्रशासन ने गहरी नींद से जागने की जहमत तक नहीं उठाई। हैरान करने वाली बात यह है कि इतने संवेदनशील और गंभीर राजनीतिक मामले में जिला प्रशासन द्वारा अब तक न तो मतदान और चर्चा के लिए किसी विशेष बैठक की तिथि घोषित की गई है और न ही इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल दिखाई दे रही है।
प्रशासन की इसी रहस्यमयी चुप्पी, उपेक्षात्मक रवैये और अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया को जानबूझकर टालने के गंभीर आरोपों के बीच सभी 13 पीड़ित जनपद सदस्यों ने सामूहिक रूप से कलेक्ट्रेट का घेराव किया और वहीं धरने पर बैठ गए। आंदोलन पर बैठे जनप्रतिनिधियों का स्पष्ट आरोप है कि जिला प्रशासन किसी अज्ञात राजनैतिक दबाव या प्रभाव में आकर वर्तमान अध्यक्ष को पिछले दरवाजे से बचाने का प्रयास कर रहा है, जो कि सीधे तौर पर पंचायती राज व्यवस्था के मूल सिद्धांतों की हत्या है।
धरना प्रदर्शन के दौरान आंदोलित सदस्यों ने कलेक्टर के नाम एक स्मरण-पत्र (रिमाइंडर) भी प्रशासनिक अधिकारी को सौंपा, जिसमें साफ तौर पर मांग की गई है कि मामले की संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक ढांचे को ध्यान में रखते हुए इस पर तत्काल संज्ञान लिया जाए। सदस्यों ने मांग की है कि बिना किसी और विलंब के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और पारदर्शी तरीके से मतदान संपन्न कराने के लिए तत्काल एक स्वतंत्र पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति की जाए और विशेष बैठक की तिथि व समय अविलंब तय किया जाए।
अंततः, जनपद सदस्यों ने जिला प्रशासन को बेहद सख्त लहजे में अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस स्मरण-पत्र के बाद भी तत्काल वैधानिक कदम नहीं उठाए गए, तो वे कानून और संविधान के दायरे में रहकर सीधे माननीय उच्च न्यायालय की शरण लेंगे और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष कलेक्ट्रेट की इस मनमानी की शिकायत दर्ज कराएंगे। धरने पर बैठने वाले और इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख चेहरों में प्रेमला सिंह, उर्मिला पाव, रानी, दुर्गावती, उषा सिंह और आराधना सहित अन्य सभी निर्वाचित सदस्य पूरी मजबूती के साथ डटे हुए हैं, जिससे स्थानीय प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है।






