
नगर निगम इंदौर की मेहनत पर स्थानीय कर्मचारियों की लापरवाही भारी, वार्डों में गंदगी का साम्राज्य
देपालपुर। संदीप सेन। देशभर में लगातार सातवीं बार स्वच्छता का सिरमौर बनकर इतिहास रचने वाला नगर निगम इंदौर इन दिनों देपालपुर को भी स्वच्छता के नक्शे पर चमकाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। महापौर पुष्पमित्र भार्गव, निगमायुक्त क्षितिज सिंघल एवं अपर निगमायुक्त प्रखर सिंह लगातार मॉनीटरिंग कर रहे हैं, निगम की विशेष टीम मैदान में उतर चुकी है, योजनाएं बन रही हैं, निरीक्षण हो रहे हैं, निर्देश जारी हो रहे हैं… लेकिन देपालपुर के कुछ स्थानीय कर्मचारी शायद इस पूरे अभियान को “स्वच्छता नहीं, औपचारिकता” समझ बैठे हैं। हालात यह हैं कि एक ओर इंदौर शहर विश्व पटल पर “स्वच्छता गुरु” का तमगा लेकर देश को दिशा दिखा रहा है, वहीं दूसरी ओर नगर परिषद देपालपुर के कुछ कर्मचारी उस छवि पर धूल उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे। नगर के वार्ड क्रमांक 7 स्थित दरी कारखाना क्षेत्र और आसपास के इलाकों में गंदगी का आलम देखकर ऐसा महसूस होता है मानो यहां सफाई व्यवस्था नहीं बल्कि “कचरा संवर्धन योजना” संचालित की जा रही हो। क्षेत्र में जगह-जगह कचरे के ढेर इस अंदाज में पसरे पड़े हैं जैसे किसी ने स्थायी प्रदर्शनी लगा दी हो। नालियों और ड्रेनेज की स्थिति तो और भी दिलचस्प है। वहां कचरा इस कदर जमा है कि पहली नजर में यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह ड्रेनेज लाइन है या नगर परिषद का अस्थायी डंपिंग यार्ड। स्थानीय रहवासियों का कहना है कि सफाई कर्मचारी मुख्य मार्गों और चौराहों पर तो सक्रिय दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे ही बात अंदरूनी गलियों और मोहल्लों की आती है, सफाई अभियान अचानक “लो बैटरी मोड” में चला जाता है। नगर में चर्चा है कि स्वच्छता अभियान फिलहाल उन रास्तों तक सीमित है जहां से अधिकारियों के वाहन गुजरते हैं। अंदरूनी वार्डों की स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वहां सफाई व्यवस्था “अगली सूचना तक स्थगित” कर दी गई हो। रहवासी व्यंग्य करते हुए कहते नजर आ रहे हैं कि देपालपुर में कुछ कर्मचारियों ने शायद यह मान लिया है कि कचरा जितना ज्यादा रहेगा, सफाई का महत्व उतना ही ज्यादा समझ आएगा। विडंबना यह है कि नगर निगम इंदौर की टीम लगातार देपालपुर पहुंचकर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने का प्रयास कर रही है। स्वच्छता के इंदौरी मॉडल को लागू करने के लिए दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं, मॉनीटरिंग की जा रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर कुछ जिम्मेदार कर्मचारियों की उदासीनता पूरे अभियान पर पानी फेरती दिखाई दे रही है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे इंदौर नगर निगम एक हाथ से देपालपुर को चमकाने में जुटा है और दूसरे हाथ से स्थानीय कर्मचारी उसी चमक पर धूल झाड़ने का अभ्यास कर रहे हैं। अब सबकी निगाहें नगर परिषद देपालपुर सीएमओ बहादुर सिंह रघुवंशी पर टिक गई हैं। साफ-सुथरी प्रशासनिक छवि रखने वाले सीएमओ बहादुर सिंह रघुवंशी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को “मैदानी स्वच्छता” का वास्तविक पाठ पढ़ाने की है। नगर में यह चर्चा भी जोरों पर है कि यदि सीएमओ ने कर्मचारियों पर सख्त लगाम कस दी, तो देपालपुर की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी, लेकिन यदि यही हालात बने रहे तो स्वच्छता सर्वेक्षण में देपालपुर का नाम शायद “कचरा प्रबंधन के प्रयोगात्मक मॉडल” के रूप में जरूर दर्ज हो सकता है। लोगों का कहना है कि देपालपुर को स्वच्छ बनाने के लिए केवल बैठकों, निर्देशों और फोटो सेशन से काम नहीं चलेगा। जब तक वार्ड स्तर पर जिम्मेदार कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक स्वच्छता अभियान केवल मुख्य चौराहों तक सीमित रह जाएगा और अंदरूनी मोहल्ले “कचरा मुक्त” होने का इंतजार ही करते रहेंगे। फिलहाल नगर में एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है — “इंदौर अपनी मेहनत से देपालपुर को चमका पाएगा… या फिर देपालपुर के कुछ कर्मचारी स्वच्छता अभियान को ऐसे ही कचरे में दबाए रखेंगे।







