अनूपपुर।शिक्षा विभाग के गलियारों से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक शुचिता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला शिक्षा केंद्र अनूपपुर में प्रतिनियुक्ति के पदों पर चहेतों को उपकृत करने के लिए नियमों का एक ऐसा ‘चक्रव्यूह’ रचा गया, जिसमें न केवल शासन के दिशा-निर्देशों को तार-तार किया गया, बल्कि जिले के सर्वोच्च अधिकारियों—कलेक्टर एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत को भी कथित रूप से अंधेरे में रखकर गुमराह किया गया। योग्यता और उम्र सीमा के मूल नियमों को ताक पर रखकर तैयार की गई यह विवादित कूटनीति अब खुलकर धरातल पर आ गई है, जिससे पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है।
जिला शिक्षा केंद्र अनूपपुर में प्रतिनियुक्ति के पदों पर की जाने वाली भर्तियों में एक बड़ा प्रशासनिक घालमेल और नियमों की अनदेखी का मामला सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, विभाग में अपनों को फायदा पहुँचाने और उन्हें मनचाहे पदों पर संलग्न करने के लिए एक पूरा चक्रव्यूह रचा गया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिले के शीर्ष अधिकारियों यानी कलेक्टर और जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी महोदया को भी कथित रूप से गुमराह किया गया है और वास्तविक निर्धारित योग्यताओं को उनसे छिपाकर रखा गया।
मनमाने ढंग से निकाली गई भर्ती, नियमों की अनदेखी
कार्यालय कलेक्टर (समग्र शिक्षा) जिला अनूपपुर द्वारा जिले के प्राचार्यों को एक पत्र जारी किया गया था। पत्र क्रमांक 998225, दिनांक 08 मई 2026 के माध्यम से विभिन्न सहायक परियोजना समन्वयक (एपीसी) के पदों पर अस्थाई रूप से पदपूर्ति करने के लिए शिक्षकों से सहमति मांगी गई थी। लेकिन इस पत्र के जारी होते ही विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से करने के बजाय बेहद गुपचुप ढंग से और मनमाने तरीके से चलाई जा रही है।
विज्ञापन प्रक्रिया को किया गया दरकिनार
नियमों के मुताबिक, जिला स्तर पर सहायक जिला परियोजना समन्वयक का पद पूर्णतः प्रतिनियुक्ति का पद होता है। नियमानुसार इस प्रकार के महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती के लिए विभिन्न समाचार पत्रों में विधिवत विज्ञापन जारी किया जाना अनिवार्य है, ताकि सभी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर मिल सके। परंतु जिला शिक्षा केंद्र द्वारा इस सर्वमान्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। विज्ञापन जारी करने के बजाय सिर्फ एक आंतरिक पत्र जारी कर गुपचुप तरीके से सहमति मांगी जा रही है, जो सीधे तौर पर पारदर्शिता का उल्लंघन है।
जिला नियुक्ति समिति की भूमिका पर उठे सवाल
इस कथित प्रशासनिक लापरवाही में केवल विज्ञापन की अनदेखी ही नहीं की गई, बल्कि जिला नियुक्ति समिति जैसी महत्वपूर्ण वैधानिक इकाई को भी पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है। समिति की अनुमति और संज्ञान के बिना सीधे पत्र जारी कर प्रक्रिया को आगे बढ़ाना इस बात की ओर इशारा करता है कि विभाग के भीतर कुछ चुनिंदा अधिकारियों द्वारा नियमों को ताक पर रखकर फैसले लिए जा रहे हैं।
चहेतों को लाभ पहुँचाने के लिए योग्यता में फेरबदल
शिकायत पत्र में सबसे गंभीर आरोप योग्यता में जानबूझकर किए गए बदलावों को लेकर लगाया गया है। जिला शिक्षा केंद्र अनूपपुर द्वारा जारी पत्र में निर्धारित योग्यताओं को इस तरह मरोड़ा गया है जिससे किसी विशेष व्यक्ति को सीधे तौर पर लाभ पहुँचाया जा सके। इसके तहत ‘सहायक परियोजना समन्वयक (समेकित शिक्षा)’ के पद के लिए जानबूझकर ‘माध्यमिक शिक्षक’ की योग्यता का उल्लेख किया गया है, जबकि अन्य अनिवार्य और मूल योग्यताओं को पूरी तरह से गायब कर दिया गया।
राज्य शिक्षा केंद्र भोपाल के मूल नियम क्या हैं?
अगर राज्य शिक्षा केंद्र, भोपाल द्वारा सहायक परियोजना समन्वयक (समेकित शिक्षा) के लिए निर्धारित वास्तविक और वैध योग्यताओं पर नज़र डालें, तो जिला शिक्षा केंद्र के दावों की पोल खुलती नज़र आती है। राज्य स्तर पर निर्धारित नियम हैं कि इस पद के लिए उम्मीदवार का व्याख्याता या उच्च श्रेणी शिक्षक होना अनिवार्य है। राज्य शिक्षा केंद्र के मूल नियमों में कहीं भी ‘माध्यमिक शिक्षक’ का कोई उल्लेख नहीं है।उम्मीदवार के पास भारतीय पुनर्वास परिषद नई दिल्ली से मान्यता प्राप्त, दृष्टि बाधित / श्रवण बाधित / मानसिक विकलांगता / सेरेबल पालिसी के शिक्षण में बी.एड. (विशेष शिक्षा) अथवा पी.जी.पी.डी. विशेष शिक्षा की डिग्री होना अनिवार्य है। जिला शिक्षा केंद्र के पत्र में इस अति-महत्वपूर्ण योग्यता को पूरी तरह छुपा लिया गया।
राज्य के नियमों के अनुसार सहायक परियोजना समन्वयक समेकित शिक्षा हेतु अधिकतम आयु 48 वर्ष निर्धारित है, जबकि अनूपपुर जिला कार्यालय द्वारा जारी पत्र में इसे बढ़ाकर 56 वर्ष उल्लेखित कर दिया गया है।
उम्र सीमा को 48 वर्ष से बढ़ाकर सीधे 56 वर्ष किया जाना इस पूरे मामले का सबसे संदेहास्पद पहलू है। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि किसी ऐसे विशिष्ट व्यक्ति को, जो अपनी उम्र के कारण इस पद के लिए अपात्र हो चुका था, पात्रता के दायरे में लाने के लिए नियमों को प्रशासनिक स्तर पर बदला गया। यह सीधे तौर पर शासकीय नियमों के साथ खिलवाड़ और गंभीर वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितता की श्रेणी में आता है।
उच्चाधिकारियों को अंधेरे में रखने का प्रयास
इस पूरे मामले में यह बात भी उभरकर सामने आई है कि जिला शिक्षा केंद्र के जिम्मेदार अधिकारियों ने इन तमाम विसंगतियों को कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत अनूपपुर से छिपाकर रखा। मूल और अनिवार्य योग्यताओं को फाइलों में दबाकर उच्चाधिकारियों को गुमराह किया गया ताकि इस विवादित प्रक्रिया पर बिना किसी रोक-टोक के प्रशासनिक मुहर लगवाई जा सके।
जांच के दायरे में स्थापना प्रभारी की भूमिका
मामले के उजागर होने के बाद अब जिला शिक्षा केंद्र अनूपपुर के स्थापना प्रभारी की भूमिका पूरी तरह से संदिग्ध मानी जा रही है। मांग की जा रही है कि स्थापना प्रभारी के स्तर पर हुए पत्राचार और उनके द्वारा तैयार की गई फाइलों की गहनता से स्क्रूटनी की जाए। यह जांच का एक बड़ा विषय है कि आखिर किसके शह पर और किस मंशा से नियमों के विपरीत जाकर यह पूरा प्रस्ताव तैयार किया गया।
निष्पक्ष जांच और दंडात्मक कार्रवाई की मांग
दस्तावेज़ में उठाए गए बिंदुओं के आधार पर यह स्पष्ट है कि यदि माध्यमिक शिक्षक की योग्यता न होने और विशेष योग्यताओं को छिपाने के बावजूद यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह योग्य शिक्षकों के साथ बड़ा अन्याय होगा। संबंधित पक्षों द्वारा मांग की जा रही है कि इस पूरी भर्ती प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोकते हुए इसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।






