प्रशासनिक अराजकता का स्याह सच

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अनूपपुर में नियमों की बलि देकर संविदा के हाथों सौंपी गई पंचायतों की वित्तीय तिजोरी
अनूपपुर। ग्रामीण विकास और सुशासन के बड़े-बड़े दावे करने वाले महकमों की असलियत का पर्दाफाश करने के लिए अनूपपुर जिला पंचायत की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था एक सटीक और जीवंत उदाहरण बन चुकी है। जहां एक ओर शासन स्तर पर पारदर्शी व्यवस्था और त्वरित विकास के कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं, वहीं धरातल पर जिला पंचायत की मनमानी और स्वेच्छाचारिता ने पंचायतराज की धुरी को ही हिलाकर रख दिया है। आलम यह है कि एक तरफ योग्य और नियमित पंचायत सचिव अपनी वैध पदस्थापना के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं, तो दूसरी तरफ नियमों को ताक पर रखकर संविदा कर्मियों को पंचायतों की अकूत वित्तीय तिजोरी की चाबी सौंप दी गई है।
प्रशासनिक संवेदनहीनता और मनमाने फैसलों के इस खेल ने अनूपपुर जिले की कार्यप्रणाली पर ऐसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब देने से जिम्मेदार अधिकारी कतराते नजर आते हैं। सवाल यह नहीं है कि किस चहेते को कौन सा प्रभार दिया जा रहा है, बल्कि मूल प्रश्न यह है कि आखिर किस वैधानिक प्रावधान के तहत एक संविदा कर्मचारी को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सौंपे जा रहे हैं, जबकि प्रशिक्षित व नियमित सचिव प्रशासनिक गलियारों की ठोकरें खाने को विवश हैं? यह स्थिति न केवल व्यवस्था का उपहास उड़ाती है, बल्कि ग्रामीण जनता के अधिकारों पर भी सीधा प्रहार करती है।

नियमित सचिवों की उपेक्षा और वर्षों का वनवास
अनूपपुर जिले में प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबना देखिए कि गिरजा यादव जैसे कई कर्मठ और नियमित पंचायत सचिव पिछले तीन वर्षों से बिना किसी प्रभार के प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। एक तरफ सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए मिशन मोड पर काम करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ अनुभवी और नियमित सचिवों को उनके हक से वंचित कर दिया जाना इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी पोल खोलता है।

संविदा कर्मियों को वित्तीय प्रभार: नियमों की सरेआम धज्जियां
नियमित सचिवों की इस उपेक्षा के ठीक विपरीत, जिला पंचायत द्वारा ग्राम रोजगार सहायकों को सचिव पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपने का सिलसिला बेरोकटोक जारी है। नियमों के मुताबिक रोजगार सहायकों को किसी अन्य पंचायत का प्रशासनिक या वित्तीय प्रभार सौंपने के कोई स्पष्ट या वैध निर्देश नहीं हैं, इसके बावजूद मौखिक आदेशों और प्रशासनिक शालीनता की आड़ में उन्हें यह संवेदनशील जिम्मेदारी थमा दी जा रही है।

तबादलों में यू-टर्न: प्रशासनिक असमंजस का प्रमाण
हाल ही में हुए पंचायत सचिवों के स्थानांतरण के दौरान भी यही लचर और मनमाना रवैया खुलकर सामने आया। तबादलों के बाद रिक्त हुई जगहों पर आनन-फानन में रोजगार सहायकों को प्रभार थमा दिया गया, लेकिन ठीक पंद्रह दिनों के भीतर ही कई पंचायतों से वह प्रभार वापस छीनकर पुनः सचिवों को सौंप दिया गया। प्रशासनिक निर्णयों में इस प्रकार का यू-टर्न इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जिले में तबादला और प्रभार नीति का पालन किसी सुविचारित नियमावली के तहत नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर हो रहा है।

करोड़ों के विकास कार्यों और तिजोरी की चाबी संविदा के हाथों में
मौजूदा समय में भी जिले की बहुतायत पंचायतों में ग्राम रोजगार सहायक ही सर्वेसर्वा बनकर जमीनी कामकाज संभाल रहे हैं। सबसे गंभीर विधिक प्रश्न यह है कि क्या एक संविदा कर्मचारी को पंचायतों का वित्तीय प्रभार सौंपा जाना किसी भी नियम से उचित ठहराया जा सकता है? मूल रूप से मनरेगा के संविदा कर्मचारी के रूप में नियुक्त किए गए कर्मियों के हाथों में करोड़ों के विकास कार्यों का हिसाब और पंचायत की तिजोरी सौंपना प्रशासनिक व्यवस्था के साथ सीधा खिलवाड़ है।

वैधानिक प्रावधानों और सीमाओं का खुला उल्लंघन
जब नियम-कायदों की बात आती है, तो स्थापित प्रशासनिक प्रावधानों और वित्तीय संहिताओं में संविदा कर्मचारियों को वित्तीय अधिकार देने को लेकर स्पष्ट प्रतिबंध व विनियामक सीमाएं तय हैं। इसके बावजूद इन नियमों को ताक पर रखकर वित्तीय प्रभार देना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के दरवाजे खोलने जैसा है। एक संविदा कर्मचारी के पास वैधानिक रूप से वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय लेने की कोई कानूनी क्षमता नहीं होती है।

धूमिल होती पारदर्शिता और जवाबदेही का संकट
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की व्यवस्था से न केवल पंचायतों में मनमानेपन को बढ़ावा मिलता है, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता भी पूरी तरह धूमिल हो जाती है। जब नियमित और प्रशिक्षित सचिव बिना काम के बैठने को मजबूर होंगे और संविदा कर्मी वित्तीय मामलों के मालिक बनेंगे, तब किसी भी स्तर पर जवाबदेही तय करना पूरी तरह असंभव हो जाता है। रोजगार सहायकों का मूल दायित्व मनरेगा योजनाओं का जमीनी क्रियान्वयन देखना है, न कि संपूर्ण पंचायत का वित्तीय और प्रशासनिक साम्राज्य संभालना।

विकास कार्यों की फाइलें और भुगतान प्रक्रियाएं प्रभावित
जिले के जिम्मेदार अधिकारियों की इस अदूरदर्शी कार्यशैली के कारण अंततः ग्रामीण जनता का ही भारी नुकसान हो रहा है, क्योंकि पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की फाइलें और भुगतान प्रक्रियाएं प्रशासनिक असमंजस और खींचतान की भेंट चढ़ रही हैं। सचिवों के हक का प्रभार अन्य को सौंपना और फिर चंद दिनों में उसमें बदलाव करना यह दर्शाता है कि जिला स्तर पर पंचायत राज अधिनियम के प्रावधानों को ठेंगा दिखाया जा रहा है।

स्थानीय निवासी होने के नाते जवाबदेही का संकट और जनता का दबाव
​इस व्यवस्था का एक और बड़ा सामाजिक और व्यावहारिक पहलू यह है कि ग्राम पंचायत का ग्राम रोजगार सहायक अमूमन उसी स्थानीय पंचायत का निवासी होता है। स्थानीय होने के कारण वहां की जनता उसके हर क्रिया-कलाप, कार्यशैली और कमियों से भली-भांति परिचित होती है, जिसके चलते कई बार वह जनता के सामाजिक और स्थानीय दबाव में स्वतंत्र रूप से विकास कार्य कराने में विफल रहता है। इसके विपरीत, यदि किसी अन्य पंचायत के नियमित सचिव को प्रभार सौंपा जाए, तो वह प्रशासनिक नियमों और आम जनता के निष्पक्ष दबाव के दायरे में रहकर अधिक पारदर्शिता के साथ विकास कार्यों को गति दे सकता है। स्थानीय संविदा कर्मियों के हाथों में प्रभार होने से भाई-भतीजावाद और स्थानीय स्तर पर पक्षपात की संभावनाएं भी कई गुना बढ़ जाती हैं

उच्च स्तरीय समीक्षा और तत्काल सुधार की दरकार
अब वक्त आ गया है कि प्रभार के इस खेल को किसने किसकी शह पर खेला और जो प्रभार के नाम पर वसूली की बातें सूत्र बता रहे हैं उसकी भी शासन और उच्च स्तर पर इस पूरे मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय समीक्षा की जाए, ताकि बिना प्रभार के भटक रहे नियमित सचिवों को उनकी पात्रता के अनुसार तुरंत पदस्थापना व कार्यभार मिल सके। साथ ही, संविदा कर्मियों को वित्तीय प्रभार देने की इस गैर-कानूनी और अनियंत्रित प्रथा पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी बेहद जरूरी है, साथ ही अधिकारियों के नाम पर हुए इस खेल का भी पर्दाफाश हो जिससे ग्रामीण विकास की गाड़ी पुनः पटरी पर लौट सके और व्यवस्था में व्याप्त इस अराजकता का अंत हो सके।