जनजातीय कार्य विभाग के बाद अब डीईओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
अनूपपुर।अनूपपुर जिले में प्रशासनिक भ्रष्टाचार का एक और घिनौना चेहरा सामने आया है। पहले से ही जनजातीय कार्य विभाग में लगभग 28 लाख रुपये के गबन के गंभीर आरोपों में घिरे जिला क्रीड़ा अधिकारी खलील कुरैशी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। जनजातीय विभाग में हुए इस गबन के मामले में उनकी संलिप्तता जाँच में पहले ही साबित हो चुकी है। अब खबर है कि उनके कार्यकाल के दौरान जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के अधीन आयोजित खेल प्रतियोगिताओं में भी लाखों रुपये के हेरफेर और फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।
यह मामला केवल वित्तीय अनियमिताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी दस्तावेजों के साथ खिलवाड़ और फर्जी बिलों के माध्यम से शासन को चूना लगाने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है। जनजातीय कार्य विभाग में सिद्ध हो चुके गबन के बाद, शिक्षा विभाग के खेल आयोजनों में सामने आई विसंगतियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अधिकारी द्वारा पद का दुरुपयोग व्यापक स्तर पर किया गया है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस नई परत खुलने के बाद क्या कठोर कदम उठाता है।
सूचना के अधिकार से मिली चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 तक अनूपपुर में ‘सेपक टेकरा’ की कोई भी राज्य या राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता आयोजित ही नहीं हुई है। इसके बावजूद, इन काल्पनिक प्रतियोगिताओं के नाम पर भारी-भरकम सरकारी राशि का आहरण कर लिया गया। कागजों पर खेल प्रतियोगिताएं आयोजित दिखाकर सरकारी धन का बंदरबांट करना, अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
इन फर्जी आयोजनों को सच साबित करने के लिए विभाग द्वारा मनगढ़ंत दस्तावेज तैयार किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि 08 दिसंबर 2025 को अमरकंटक के बालक-कन्या क्रीड़ा परिसर में एक बड़ी प्रतियोगिता आयोजित होने का दावा किया गया, जबकि स्थानीय स्तर पर पुष्टि करने पर पता चला कि उस दिन वहां कोई भी आयोजन हुआ ही नहीं था। यह स्पष्ट रूप से सरकारी धन के दुरुपयोग और धोखाधड़ी का मामला है।
खेल सामग्रियों की खरीदी में भी भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। जांच में पता चला है कि खेल प्रतियोगिता के मद में ऐसे बिल प्रस्तुत किए गए हैं जो पूरी तरह से तर्कहीन और संदिग्ध हैं। एक किराना स्टोर से हथौड़ी और कील जैसी सामग्रियों के बिल खेल विभाग के खाते में लगाए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि इन बिलों में कीलों का मूल्य 250 रुपये प्रति किलो के हिसाब से दर्शाया गया है, जिसका खेल प्रतियोगिताओं से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।
प्रस्तुत किए गए बिलों में भारी विसंगतियां हैं। खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन स्थल को लेकर भी भारी भ्रम की स्थिति है। कई बिलों में आयोजन स्थल का नाम तक अंकित नहीं है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इन बिलों का उपयोग केवल और केवल राशि की निकासी के लिए किया गया है। यह प्रशासनिक प्रक्रिया के घोर उल्लंघन का मामला है, जहां बिना किसी साक्ष्य के लाखों रुपये का भुगतान कर दिया गया।
दस्तावेजों में उल्लेख है कि 11 सितंबर 2024 को फुटबॉल प्रतियोगिता आयोजित की गई थी, लेकिन यह प्रतियोगिता कहां और किन टीमों के बीच हुई, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। बिना किसी स्पष्ट स्थल, बिना खिलाड़ियों की भागीदारी और बिना किसी प्रमाण के लाखों रुपये का भुगतान कर देना विभाग की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
इसी तरह, 10 सितंबर 2024 की बैडमिंटन प्रतियोगिता के नाम पर 100 नग कुर्सी और 5 टेबल का बिल लगाया गया, लेकिन इन सामग्रियों के उपयोग और किस स्थल पर इनका उपयोग हुआ, इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है। स्पष्ट है कि ये सामग्रियां खेल के नाम पर खरीदी ही नहीं गईं, बल्कि बिलों को फर्जी तरीके से तैयार कर राशि का गबन किया गया है।
प्रशासनिक जवाबदेही पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जनजातीय कार्य विभाग में 28 लाख रुपये के गबन के मामले में खलील कुरैशी दोषी पाए जा चुके थे, तो शिक्षा विभाग में उन्हें खेल बजट जैसे संवेदनशील कार्यों का प्रभार कैसे दिया गया? इस नियुक्ति ने उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन्होंने एक दागदार अधिकारी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी।
अब स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष उच्च-स्तरीय जाँच हो। जनसामान्य की मांग है कि जनजातीय कार्य विभाग और शिक्षा विभाग दोनों के भ्रष्टाचार की एक साथ जाँच की जाए और दोषी अधिकारी खलील कुरैशी के साथ-साथ उन सभी जिम्मेदार व्यक्तियों से वसूली की जाए जिन्होंने इस फर्जीवाड़े में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद की है।








