कानून के रक्षक ही बने चुनौती! सिविल कोर्ट के स्टे ऑर्डर को ठेंगा दिखा रहे थाना प्रभारी, तहसीलदार के आदेश की रट

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अनूपपुर: कानून के रक्षक ही बने चुनौती! सिविल कोर्ट के स्टे ऑर्डर को ठेंगा दिखा रहे थाना प्रभारी, तहसीलदार के आदेश की रट
न्यायालय की अवमानना का खुला खेल: जिम्मेदार मौन
अनूपपुर जिले के सामतपुर में एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है, जहाँ न्यायपालिका की गरिमा को दरकिनार करते हुए कानून के रक्षक माने जाने वाले अधिकारी ही न्यायालय के आदेशों को मानने से इनकार कर रहे हैं। मामला सामतपुर की एक विवादित भूमि (खसरा नंबर 290/2/1/1) से जुड़ा है, जहाँ सिविल कोर्ट अनूपपुर ने स्पष्ट रूप से स्थगन आदेश जारी कर रखा है।
पीड़ित पक्ष सनत कुमार त्रिपाठी ने इस संबंध में थाना कोतवाली अनूपपुर में एक औपचारिक शिकायत भी दर्ज कराई है।शिकायत पत्र के अनुसार, पीड़ित ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि न्यायालय द्वारा पारित स्थगन आदेश के बावजूद प्रतिवादीगण उक्त भूमि पर जबरन कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं। शिकायत में यह भी बताया गया है कि 05/07/2026 को प्रतिवादियों ने मौके पर विवाद उत्पन्न किया और जान से मारने की धमकी दी।
पुलिस का अजीबोगरीब तर्क
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि जब वे न्याय के लिए कोतवाली प्रभारी के पास पहुँचे और कोर्ट का स्टे ऑर्डर दिखाया, तो थाना प्रभारी ने उसे मानने से साफ इनकार कर दिया। उनका अजीबोगरीब तर्क है कि उन्हें केवल तहसीलदार महोदय का स्टे चाहिए, सिविल कोर्ट के आदेश की उनके लिए कोई अहमियत नहीं है। यह स्थिति न केवल न्यायपालिका की अवमानना है, बल्कि आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का भी सरासर उल्लंघन है।

विवाद की जड़: खसरा नंबर 290/2/1/1 और दबंगों का कब्ज़ा
विवाद का मुख्य केंद्र सामतपुर की खसरा नंबर 290/2/1/1 भूमि है, जो कुल 0.800 हेक्टेयर में फैली है। इस भूमि के स्वामी सनत कुमार त्रिपाठी हैं। लंबे समय से इस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, जिसके चलते सनत कुमार ने अनूपपुर के वरिष्ठ व्यवहार न्यायाधीश के समक्ष व्यवहार वाद (केस नंबर 283/2018) दायर किया था। इस मामले में न्यायालय ने 10/01/2019 को ही प्रतिवादियों के खिलाफ स्थगन आदेश पारित कर दिया था, ताकि विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण या कब्ज़ा न किया जा सके।

न्यायालय के आदेश का बार-बार उल्लंघन
कोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद, विपक्षी पक्ष लगातार इस भूमि पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। पीड़ित का आरोप है कि विपक्षी पक्ष ने पहले भी कोर्ट के आदेशों की धज्जियाँ उड़ाई हैं। पूर्व में भी विवाद के दौरान प्रतिवादियों ने पीड़ित के साथ गंभीर मारपीट की थी, जिसके चलते धारा 307 के तहत मामला दर्ज हुआ था।

जेसीबी चलाकर भूमि की सफाई और साजिश के तहत विक्रय*l
17 मार्च 2026 को विपक्षीगणों की सहमति से विवादित भूमि पर जेसीबी मशीन चलाकर सफाई की गई और लगे हुए पेड़ों को जड़ से उखाड़ दिया गया। इसके अलावा, पीड़ित का आरोप है कि मामले के विचाराधीन रहने के दौरान, प्रतिवादी गणपत राठौर और चरणदास राठौर ने मिलीभगत करके उक्त विवादित भूमि को चोरी-छिपे ज्योति नंदा और उनके पति जे.एल. नंदा को बेचने का प्रयास किया। यह कार्रवाई कोर्ट की प्रक्रिया को चुनौती देने के उद्देश्य से की गई है।

पुलिस की कार्यशैली पर खड़े होते गंभीर सवाल
पुलिस का यह कहना कि ‘उन्हें केवल तहसीलदार का स्टे चाहिए न्याय व्यवस्था के प्रति उनकी समझ पर बड़े सवाल खड़ा करता है। यदि पुलिस ही कोर्ट के आदेशों को दरकिनार करने लगेगी, तो एक सामान्य नागरिक न्याय की उम्मीद आखिर किससे करेगा? पीड़ित की मांग है कि पुलिस को निर्देशित किया जाए कि वे न्यायालय के स्थगन आदेश का पालन सुनिश्चित करें, मौके पर शांति व्यवस्था बनाए रखें और पीड़ित की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
अब देखना यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले में हस्तक्षेप करते हैं या इसी तरह सिविल कोर्ट के आदेशों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ती रहेंगी।