अनूपपुर में एसीसी माइनिंग: सत्ता, प्रशासन और कॉर्पोरेट का ‘अवैध’ गठजोड़, किसानों के अस्तित्व और पर्यावरण पर मंडराता संकट
पं अजय मिश्र
मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में एसीसी माइनिंग परियोजना एक ऐसे ‘खूनी खेल’ का केंद्र बन गई है, जहाँ कानून और जनभावनाओं को हाशिए पर रखकर कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी जा रही है। सत्ताधारी नेताओं के संरक्षण और प्रशासनिक अधिकारियों की कथित मिलीभगत से कंपनी न केवल वनभूमि बल्कि किसानों की निजी उपजाऊ जमीनों को भी हड़पने की साजिश रच रही है।
खनन की यह कवायद अब केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि किसानों के हक और पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों पर एक संगठित प्रहार बन चुकी है। जनसुनवाई के दौरान सामने आई अनियमितताओं, EIA रिपोर्ट की अनुपलब्धता और पर्यावरण संरक्षण कानूनों की सरेआम अनदेखी ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
. सत्ता का संरक्षण और बेलगाम कंपनी
अनूपपुर में एसीसी माइनिंग की गतिविधियां इस बात को पुष्ट करती हैं कि यहाँ ‘कानून का राज’ नहीं, बल्कि ‘कॉर्पोरेट राज’ प्रभावी है। सत्ता के गलियारों में बैठे रसूखदार नेताओं का संरक्षण पाकर कंपनी मनमानी पर उतारू है। मुआवजा और उचित कानूनी अधिग्रहण की प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार कर जिस तरह से खनन की तैयारी की जा रही है, उससे स्पष्ट है कि कंपनी को राजनीतिक आशीर्वाद प्राप्त है और प्रशासन केवल कंपनी के हितों को साधने में लगा है।
नियमों की सरेआम धज्जियां
मध्य प्रदेश के खनन नियम और ‘पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986’ स्पष्ट रूप से निर्देशित करते हैं कि बिना पर्यावरणीय स्वीकृति और वनभूमि का मुआवजा जमा किए खनन गतिविधियां संचालित करना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद, एसीसी कंपनी ने इन नियमों को कूड़ेदान में डाल दिया है। बिना अधिग्रहण के निजी जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश यह साबित करती है कि कंपनी और उसके आकाओं को न तो संवैधानिक प्रावधानों की परवाह है और न ही कानून का कोई भय।
जनसुनवाई का ‘लोकतंत्र विरोधी’ चेहरा
पर्यावरण जनसुनवाई, जो पारदर्शिता और लोकतांत्रिक चर्चा का मुख्य आधार होनी चाहिए थी, उसे कंपनी ने एक ‘दबाव तंत्र’ में परिवर्तित कर दिया है। 50 से अधिक सुरक्षाकर्मियों और 12 बाउंसरों की मौजूदगी में आयोजित यह सुनवाई लोकतंत्र का अपमान है। स्थानीय ग्रामीणों की वास्तविक आवाज को कुचलने के लिए कंपनी ने ‘पेड समर्थकों’ का सहारा लेकर खुद को बेदाग साबित करने का जो घटिया खेल खेला है, वह उसकी नैतिक हताशा को दर्शाता है
. ई आई ए रिपोर्ट का गायब होना: एक बड़ा पर्यावरणीय अपराध
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि जिस पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट पर जनसुनवाई आधारित होनी चाहिए थी, वह मौके पर उपलब्ध ही नहीं थी। ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006’ के तहत परियोजना प्रस्तावक का यह कानूनी दायित्व है कि वह जनसुनवाई से पहले पूरी रिपोर्ट आम जनता के लिए सुलभ कराए। कोतमा के जनपद अध्यक्ष और प्रभावित सरपंचों ने खुले मंच से स्पष्ट किया कि ऐसी कोई रिपोर्ट उनके पास उपलब्ध नहीं है। प्रदूषण विभाग के अधिकारियों का इस पर चुप्पी साधे रखना उनकी संदेहास्पद भूमिका को उजागर करता है।
. डॉ. अशोक तिवारी की संदेहास्पद भूमिका
प्रकरण में डॉ. अशोक तिवारी का नाम ग्रामीणों के निशाने पर है। उन पर आरोप है कि उन्होंने प्रशासनिक पद की मर्यादा को ताक पर रखकर कंपनी के लिए माहौल बनाने का कार्य किया। जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों की आपत्ति को अनसुना करना और कंपनी के पक्ष में एकतरफा कार्यवाही को आगे बढ़ाना यह सिद्ध करता है कि यह सुनवाई एक पूर्व-नियोजित नाटक थी, जिसका उद्देश्य केवल खनन को ‘क्लीन चिट’ दिलाना था।
‘चोरी-चोरी’ रजिस्ट्री का षड्यंत्र
किसानों की मांग स्पष्ट है—’जमीन के बदले जमीन’ और खनन से होने वाले मुनाफे में उचित हिस्सेदारी। लेकिन उन्हें बदले में मिला है—धोखा। ग्रामीणों का गंभीर आरोप है कि प्रशासन और कंपनी मिलकर उनकी जमीनों की ‘चोरी-चोरी’ रजिस्ट्री कराने का काला खेल खेल रहे हैं। जब जमीन का वैधानिक अधिग्रहण ही नहीं हुआ है, तो प्रशासन की देखरेख में रजिस्ट्री कैसे हो रही है? यह सवाल सीधे शासन की निष्ठा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
अपनी ही जमीन पर बेगाने हुए किसान
कानून के अनुसार निजी भूमि पर जबरन खनन करना अपराध है, लेकिन अनूपपुर के किसान आज अपने ही खेतों में बेगाने हो गए हैं। सत्ता के रसूखदार नेताओं और कंपनी की यह सांठगांठ यदि समय रहते नहीं टूटी, तो न केवल किसानों का अस्तित्व मिट जाएगा, बल्कि पर्यावरण का भी अपूरणीय नुकसान होगा। क्या सरकार के कान पर जूं रेंगेंगी, या फिर ये किसान अपनी जमीन बचाने के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे?
प्रशासनिक मिलीभगत का जीता-जागता प्रमाण
जनसुनवाई के दौरान जब सरपंचों और जनपद अध्यक्ष ने खुलेआम रिपोर्ट न मिलने की बात कही, तो प्रदूषण विभाग के अधिकारी कंपनी के पक्ष की ही बातें सुनने में मशगूल रहे। ‘जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम’ और ‘वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम’ के तहत पर्यावरण विभाग को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी थी, लेकिन यहाँ अधिकारी स्वयं कंपनी के वकील की भूमिका में नजर आए।
पारिस्थितिकी तंत्र और जल स्रोतों पर खतरा
खनन क्षेत्र के पास मौजूद जल स्रोत और वन संपदा इस परियोजना से सीधे प्रभावित होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना विस्तृत पर्यावरणीय सुरक्षा योजना के खनन से अनूपपुर के भू-जल स्तर पर बुरा असर पड़ेगा और प्रदूषण बढ़ेगा। स्थानीय स्तर पर हो रहे विरोध के बावजूद अधिकारियों की संवेदनहीनता इसे और भी गंभीर बनाती है, क्योंकि यह सीधे तौर पर सतत विकास के लक्ष्यों का उल्लंघन है।
न्याय की आस में जनता की दहाड़
अनूपपुर के किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। जनसुनवाई में हुए प्रहसन और प्रशासन की पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली ने ग्रामीणों का भरोसा तंत्र से पूरी तरह उठा दिया है। यदि सरकार ने इस पूरे प्रकरण की उच्च-स्तरीय निष्पक्ष जांच नहीं कराई, तो अनूपपुर की यह चिंगारी पूरे प्रदेश में जन-आंदोलन का रूप ले सकती है। न्याय अब केवल एक शब्द नहीं, बल्कि किसानों के अस्तित्व और पर्यावरण को बचाने की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।








