अमरकंटक में ‘कंक्रीट का जंगल’ बनाम एनजीटी के निर्देश: प्रशासन की कार्रवाई के बीच अस्तित्व बचाने की जंग

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अमरकंटक में ‘कंक्रीट का जंगल’ बनाम एनजीटी के निर्देश: प्रशासन की कार्रवाई के बीच अस्तित्व बचाने की जंग
पं अजय मिश्र
​अमरकंटक: माँ नर्मदा की उद्गम स्थली और जैव विविधता से संपन्न अमरकंटक वर्तमान में अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। एक तरफ जहाँ एनजीटी ने इस संवेदनशील क्षेत्र को ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील घोषित कर रखा है, वहीं दूसरी ओर धड़ल्ले से पनप रहे ‘कंक्रीट के जंगल’ इस पवित्र नगरी की नैसर्गिक सुंदरता को लील रहे हैं। बुधवार, 10 जून 2026 को वार्ड क्रमांक 14 में की गई 22 अवैध अतिक्रमणों को हटाने की कार्रवाई को इसी बड़े संकट की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
​एनजीटी के स्पष्ट निर्देश और जमीनी हकीकत
​अमरकंटक को ‘इको-सेंसिटिव जोन’ घोषित करते हुए एनजीटी ने बार-बार कड़े निर्देश दिए हैं कि यहाँ के पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए अनियंत्रित निर्माणों पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। एनजीटी का मानना है कि निर्माण गतिविधियों के बढ़ने से अमरकंटक की जल निकासी व्यवस्था, नर्मदा के उद्गम स्थल और जंगलों पर बुरा असर पड़ रहा है। हालांकि, कागजों पर जारी ये आदेश धरातल पर दम तोड़ते नजर आ रहे हैं, जिसका परिणाम शहर के चारों ओर फैलते अवैध कंक्रीट के ढांचों के रूप में सामने आ रहा है।
​वार्ड 14 की कार्रवाई: क्या यह महज एक खानापूर्ति है?
​बुधवार को सीएमओ चैन सिंह परस्ते के नेतृत्व में की गई कार्रवाई में 15 बाड़ियां, 4 झोपड़ियां और 3 कच्चे मकान तोड़े गए। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान नगर के सौंदर्यीकरण और सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब एनजीटी पूरे अमरकंटक में निर्माण कार्यों पर लगाम लगाने के लिए सख्त है, तब प्रशासन केवल छोटे स्तर के अतिक्रमणों को हटाने तक क्यों सीमित है? शहर में बन रहे बड़े-बड़े पक्के मकान और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स आज भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।
​कंक्रीट के जंगल में बदलता प्राकृतिक सौंदर्य
​अमरकंटक, जो कभी सघन वनों और प्राकृतिक जल स्रोतों के लिए जाना जाता था, आज कंक्रीट की चपेट में है। अवैध अतिक्रमणों के कारण न केवल भू-जल स्तर गिर रहा है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण मिट्टी का कटाव और ढलानों पर निर्माण से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब यह पवित्र नगरी कंक्रीट के एक ऐसे निर्जीव जंगल में बदल जाएगी, जहाँ नर्मदा का उद्गम स्थल भी अपना गौरव खो देगा।
​रसूखदारों के आगे क्यों नतमस्तक है तंत्र?
​आम जनमानस के बीच सबसे बड़ी चर्चा यह है कि अवैध अतिक्रमण की जद में केवल गरीब और छोटे अतिक्रमणकारी ही क्यों आते हैं? अमरकंटक में कई प्रभावशाली और रसूखदार व्यक्तियों ने दशकों से शासकीय भूमि और वन भूमि पर कब्जा कर आलीशान निर्माण कर रखे हैं। एनजीटी के आदेशों की धज्जियां उड़ाने वाले इन ‘बड़े माफियाओं’ पर बुलडोजर की कार्रवाई न होना, प्रशासन की मंशा पर संदेह पैदा करता है। निष्पक्ष न्याय और पर्यावरण संरक्षण की मांग करने वाले नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को ‘चुनिंदा’ नहीं, बल्कि ‘पूर्ण’ कार्रवाई करनी चाहिए।
​ड्रोन निगरानी: क्या तकनीकी समाधान पर्याप्त है?
​नगर परिषद द्वारा ड्रोन कैमरों से नियमित निगरानी का निर्णय एक स्वागत योग्य कदम है। यह तकनीक नए अतिक्रमणों को रोकने में सहायक हो सकती है। हालांकि, केवल निगरानी पर्याप्त नहीं है; जब तक अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी और एनजीटी के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक यह तकनीक केवल दिखावा बनकर रह जाएगी। अमरकंटक को बचाने के लिए अब प्रशासनिक इच्छाशक्ति को एनजीटी के सख्त रुख के साथ जोड़ने की तत्काल आवश्यकता है।
​पर्यावरण सुरक्षा बनाम विकास की चुनौती
​अमरकंटक के निवासियों के सामने भी एक बड़ी चुनौती है। बढ़ती जनसंख्या और पर्यटन के दबाव के बीच स्थानीय लोग विकास की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन यह विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं हो सकता। अमरकंटक की पवित्रता और पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखने के लिए मास्टर प्लान का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी भी एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर कंक्रीट के निर्माण जारी रहे, तो यह क्षेत्र भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील हो जाएगा।
​: समय रहते चेतने की जरूरत
​अंततः, अमरकंटक का भविष्य केवल अतिक्रमण विरोधी अभियानों पर ही नहीं, बल्कि प्रशासन, शासन और स्थानीय जनता की सामूहिक जिम्मेदारी पर टिका है। एनजीटी के आदेश कोई औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि इस पावन नगरी को बचाने के लिए ‘जीवन-रेखा’ हैं। यदि प्रशासन ने रसूखदारों को बचाना बंद कर समान रूप से कार्रवाई शुरू नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब अमरकंटक अपनी पहचान खो देगा। अब समय आ गया है कि ‘कंक्रीट के जंगल’ के प्रसार को रोककर इस आध्यात्मिक नगरी के प्राकृतिक स्वरूप को पुनर्जीवित किया जाए।
​अमरकंटक की इस बिगड़ती पर्यावरणीय स्थिति और अतिक्रमण की समस्या को देखते हुए,प्रशासन को रसूखदार अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए?