हवा पर ‘सियासी’ पहरा: चुनाव प्रचार में उड़ते हैं अरबों रुपये, पर देश को सांस देने के लिए प्रति व्यक्ति सिर्फ ₹21 का बजट!
विश्व पर्यावरण दिवस पर कागजों में सिमटा संविधान का अनुच्छेद 21, पावर प्लांटों के धुएं में घुट रहा अनूपपुर का दम
अनूपपुर।
पं अजय मिश्र
एक तरफ आसमान छूता चुनावी खर्च, वादों की रैलियां और सत्ता पाने के लिए पानी की तरह बहाए जाते अरबों-खरबों रुपये; दूसरी तरफ देश की जनता को घुटती हुई हवा से बचाने के लिए बजट के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरा! जब पूरा विश्व ‘पर्यावरण दिवस’ मना रहा है, तब भारत की सबसे कड़वी हकीकत यह है कि देश की हवा और पर्यावरण को साफ रखने के लिए सरकार जितना बजट देती है, वह देश की आबादी के हिसाब से प्रति व्यक्ति मात्र ₹21 बैठता है। देश में हर मिनट प्रदूषण से 5 लोगों की मौत हो रही है, लेकिन तंत्र पर्यावरण सुधार से ज्यादा अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में मसरूफ है। विकास की इसी अंधी दौड़ की सबसे दर्दनाक तस्वीर मध्य प्रदेश का अनूपपुर जिला बना हुआ है, जहां पावर प्लांटों से निकलने वाला धुआं और राख स्थानीय इंसानी जिंदगियों को लील रही है।
आंकड़ों की हकीकत को समझें तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का कुल वार्षिक बजट महज ₹2675.42 करोड़ है। इस मामूली बजट का भी एक बड़ा हिस्सा (लगभग ₹1400 करोड़) सिर्फ दफ्तरों को संभालने, प्रशासनिक खर्चों और राज्यों को बांटने में चला जाता है। समूचे उत्तर भारत समेत देश के अन्य हिस्सों को सर्दियों में गैस चैंबर बनने से बचाने के लिए सीधे तौर पर सिर्फ ₹489.53 करोड़ ही जुड़ते हैं। हद तो यह है कि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर लगाम लगाने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ को पूरे साल के लिए मात्र ₹74.30 करोड़ का बजट थमा दिया जाता है।
इस सरकारी उदासीनता ने देश में एक भयानक व्यापारिक विडंबना को जन्म दिया है। जहां सरकार का पूरा पर्यावरण बजट ₹2675.42 करोड़ है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता को प्रदूषण से बचाने के उपाय, मास्क, एयर प्यूरीफायर और पानी साफ करने वाले उपकरण बेचने वाली प्राइवेट कॉर्पोरेट इंडस्ट्रीज का सालाना मुनाफा ₹5,000 करोड़ से पार हो चुका है। यानी जो हवा और पानी नागरिकों को मुफ्त और साफ मिलना चाहिए था, उसे साफ करने का जिम्मा अब उन निजी कंपनियों के पास है जो जनता की मजबूरी से अपनी तिजोरियां भर रही हैं। जब देश के बड़े शहर और औद्योगिक क्षेत्र गैस चैंबर बनते हैं, तब नीतियां और राजनेता जमीन पर कम, रैलियों या विदेश दौरों में ज्यादा व्यस्त दिखते हैं।
संवैधानिक तौर पर यह स्थिति देश के नागरिकों के साथ एक क्रूर मजाक जैसी है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को ‘जीने का अधिकार’ देता है। देहरादून खदान केस (1988) और एमसी मेहता बनाम भारतीय संघ (1987) में देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ शब्दों में व्यवस्था दी थी कि प्रदूषण रहित वातावरण में जीना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन जब देश में हर मिनट 5 लाशें प्रदूषण के कारण गिर रही हों, तो यह सवाल पूछना लाजिमी हो जाता है कि क्या यह मौलिक अधिकार सिर्फ कानूनी किताबों और भाषणों तक ही सीमित रह गया है?
इस राष्ट्रीय त्रासदी का सबसे बड़ा भुक्तभोगी मध्य प्रदेश का अनूपपुर जिला है। अनूपपुर जिला दशकों से देश को रोशन करने के लिए अपनी छाती पर कोयला खदानों और पावर प्लांटों का बोझ उठा रहा है। अमलाई स्थित ओरिएंट पेपर मिल और चचाई का अमरकंटक थर्मल पावर स्टेशन वर्षों से प्रदूषण उगल रहे हैं, तो वहीं जैतहरी में स्थापित हिंदुस्तान पावर (पूर्व में मोजर बेयर) जैसी विशाल परियोजनाओं ने क्षेत्र की आबोहवा को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। त्रासदी यहीं खत्म नहीं हो रही, बल्कि इस क्षेत्र में नए पावर प्लांटों की स्थापना और पुराने प्लांटों के विस्तार की नई तैयारियों ने स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों के भविष्य पर मौत का वारंट लिख दिया है।
थर्मल पावर प्लांटों की गगनचुंबी चिमनियों से चौबीसों घंटे निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड (SO_2) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO_x) जैसी जहरीली गैसें अनूपपुर की हवा को ‘धीमा जहर’ बना चुकी हैं। चचाई और जैतहरी के आस-पास के दर्जनों गांवों में ‘फ्लाई एश’ (कोयले की बारीक राख) का उड़ना एक अंतहीन काली रात जैसा है। यह राख केवल फसलों की हरियाली को नहीं निगल रही, बल्कि सांस के जरिए यहां के मासूम बच्चों और बुजुर्गों के फेफड़ों को छलनी कर रही है। पावर प्लांटों के एश डाइक (राख बांधों) से रिसने वाला जहरीला पानी खेतों को बंजर और दलदल में तब्दील कर चुका है।
प्रदूषण के इस तांडव का सबसे खौफनाक असर स्थानीय मानव जीवन और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अनूपपुर के ग्रामीण अंचलों में दमा क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, टीबी और फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की तादाद में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। इसके अतिरिक्त, पावर प्लांटों और कोयला खदानों के हैवी मेटल कचरे के कारण भूजल खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुका है। पानी में फ्लोराइड की अधिकता से लोग चर्म रोग और हड्डियों के टेढ़े होने की गंभीर बीमारी का शिकार होकर असमय अपाहिज हो रहे हैं। आने वाली पीढ़ी शारीरिक रूप से कमजोर और बीमार पैदा होने को मजबूर है।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल तंत्र की नीयत पर उठता है। जब देश की सर्वोच्च प्रदूषण नियंत्रण संस्था का बजट खुद ₹74 करोड़ हो, तो अनूपपुर जैसे आदिवासी बहुल जिले में क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास उद्योगों की मॉनिटरिंग करने और दोषी कंपनियों पर जुर्माना लगाने के संसाधन कहां से आएंगे? बड़े उद्योगपति सीएसआर के नाम पर दिखावा करते हैं और अरबों का मुनाफा लेकर चलते बनते हैं, जबकि यहां के लोग सिर्फ बीमारियां झेलते हैं। आज पर्यावरण दिवस पर केवल पौधों के साथ तस्वीरें खिंचवाने के पाखंड को बंद करना होगा। आज वक्त है व्यवस्था के गिरेबां में हाथ डालकर यह पूछने का कि सत्ता की इस जंग में अनूपपुर के नागरिकों की सांसों का सौदा कब तक होता रहेगा?








