केवई नदी के अस्तित्व पर संकट: जल सत्याग्रह पर बैठे युवा, मुख्यमंत्री के दौरे के बाद भी प्रशासन मौन

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केवई नदी के अस्तित्व पर संकट: जल सत्याग्रह पर बैठे युवा, मुख्यमंत्री के दौरे के बाद भी प्रशासन मौन
अवैध रेत उत्खनन और नियमों को ताक पर रखकर बन रहे अनिकट के खिलाफ फूटा जन-आक्रोश

​एक ओर जल सत्याग्रह की गूँज और दूसरी ओर सत्ता की ख़ामोशी;
केवई नदी के अस्तित्व पर मंडराते संकट ने आज विकास और विनाश की बहस को अनूपपुर की सड़कों से निकालकर नदी की लहरों के बीच खड़ा कर दिया है। जहाँ क्षेत्रीय युवा अपनी जीवनदायिनी नदी को अवैध उत्खनन, नियमों को ताक पर रखकर बनाए जा रहे अनिकटों और सीने को चीरती अवैध रेत की सड़कों से बचाने के लिए जल समाधि लेने को आतुर हैं, वहीं प्रदेश के मुखिया का बिजुरी दौरा इन युवाओं की पुकार सुने बिना समाप्त हो गया। प्रशासन की ‘खानापूर्ति’ वाली कार्यप्रणाली और अवैध निर्माणों को दी गई मौन स्वीकृति ने अब इस संघर्ष को केवल एक विरोध नहीं, बल्कि केवई नदी के पुनर्जन्म की लड़ाई बना दिया है।”
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू प्रशासन की वह कथित ‘मूक-सहमति’ है, जो नदी की धारा को बांधकर बनाई गई रेत की सड़क के रूप में प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है, जो न केवल एनजीटी के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है बल्कि जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा भी है। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि स्थानीय प्रशासन को पूर्व में भी जनसुनवाई के माध्यम से अवैध उत्खनन और निर्माणाधीन अनिकटों की शिकायतें दी गई थीं, लेकिन ठोस दंडात्मक कार्रवाई के अभाव में कंपनियों और रेत माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। युवाओं का यह जल सत्याग्रह केवल प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ एक विद्रोह नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है जहाँ प्रदेश के सर्वोच्च मुखिया की मौजूदगी के बावजूद जनता की बुनियादी मांगों को अनसुना कर दिया गया और कोतमा एसडीएम के माध्यम से की गई जांच महज एक विभागीय औपचारिकता बनकर रह गई।
कोतमा/अनूपपुर |
मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के कोतमा क्षेत्र से गुजरने वाली केवई नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। नदी के सीने को छलनी कर किए जा रहे अवैध रेत उत्खनन और पर्यावरण नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाकर बनाए जा रहे अनिकटों ने स्थानीय जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। इसी के विरोध में अनुज गौतम और उनके साथ बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं ने नदी के बीचों-बीच खड़े होकर ‘जल सत्याग्रह’ का बिगुल फूंक दिया है। उनकी मांग स्पष्ट है: केवई नदी को विनाश से बचाया जाए और भ्रष्टाचार के इस खेल को तुरंत रोका जाए।
प्रस्तुत शिकायतों के अनुसार, केवई नदी पर थर्मल पावर प्लांट द्वारा कंक्रीट निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, जिन्हें लेकर स्थानीय नागरिकों में भारी रोष है। ग्रामीणों का आरोप है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने के लिए बनाए जा रहे ये अनिकट और प्रस्तावित बैराज न केवल पर्यावरणीय नियमों के विरुद्ध हैं, बल्कि इनसे नदी का भविष्य पूरी तरह संकट में पड़ गया है। ताज्जुब की बात यह है कि शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने इन निर्माण कार्यों पर रोक लगाने के बजाय मौन स्वीकृति दे रखी है।
सबसे हैरान करने वाला दृश्य रेत ठेकेदार द्वारा नदी के बीचों-बीच रेत से बनाई गई वह सड़क है, जिसका उपयोग भारी वाहनों के आवागमन के लिए किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि नदी के प्रवाह क्षेत्र के भीतर यह सड़क बनाने का आदेश आखिर किसने दिया? क्या पर्यावरण विभाग या माइनिंग विभाग ने इसके लिए अनुमति प्रदान की थी? यह कृत्य न केवल जल अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि यह नदी के पारिस्थितिक तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँचा रहा है।
युवाओं के इस आंदोलन के दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम तब देखने को मिला जब प्रदेश के मुख्यमंत्री बिजुरी क्षेत्र के दौरे पर आए। सत्याग्रही युवाओं को उम्मीद थी कि सूबे के मुखिया उनकी पुकार सुनेंगे और केवई नदी के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे। लेकिन अफसोस, मुख्यमंत्री महोदय आए और चले गए, पर इन युवाओं की आवाज उनके कानों तक नहीं पहुँच सकी। सत्ता के इस बेरुखी भरे रवैये ने आंदोलनकारियों के मन में गहरी निराशा भर दी है।
आंदोलन के बढ़ते दबाव को देखते हुए जिला प्रशासन ने औपचारिकता निभाने के लिए कोतमा एसडीएम को मौके पर भेजा। हालांकि, आंदोलनकारियों का कहना है कि यह दौरा केवल एक ‘खानापूर्ति’ बनकर रह गया। एसडीएम ने युवाओं को ठोस आश्वासन देने के बजाय गोल-मोल बातें कीं, जिससे आक्रोश और बढ़ गया। युवाओं का आरोप है कि प्रशासन जांच के नाम पर केवल समय व्यतीत कर रहा है, जबकि धरातल पर अवैध उत्खनन और अवैध निर्माण बदस्तूर जारी है।
पूर्व में की गई जनसुनवाई और शिकायतों पर कोई प्रभावी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। जल संसाधन विभाग और खनिज विभाग के बीच शिकायतों को एक-दूसरे पर टालने का खेल चलता रहा, जिसका सीधा फायदा रेत माफिया उठा रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि जल्द ही उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो केवई नदी केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।
सत्याग्रही युवाओं की मांग है कि चंगेरी क्षेत्र और नदी के अन्य हिस्सों में हो रहे अवैध रेत उत्खनन की उच्च स्तरीय जांच की जाए और इसमें संलिप्त वाहनों व व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई हो। साथ ही, अगले 48 घंटों के भीतर एक निष्पक्ष संयुक्त जांच समिति गठित करने की मांग की गई है। युवाओं ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन लिखित आदेश जारी नहीं करता है, तो वे आंदोलन को और उग्र बनाएंगे।
इस पूरे प्रकरण में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी साफ़ नजर आती है। किसी भी नदी पर निर्माण कार्य के लिए आवश्यक ईआईए (पर्यावरण प्रभाव आकलन) और अन्य स्वीकृतियों को लेकर भारी अनियमितताएं बरती गई हैं। रेत निकासी के लिए नदी के बीच सड़क बनाना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के निर्देशों की अवहेलना है। क्या प्रशासन इन नियमों से अनभिज्ञ है या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
केवई नदी केवल एक जलस्रोत नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की जीवनरेखा है। इसके जल स्तर के गिरने से आस-पास के दर्जनों गांवों में पेयजल संकट खड़ा हो सकता है। युवाओं का यह जल सत्याग्रह केवल रेत के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के हक की लड़ाई है। वे चाहते हैं कि विकास के नाम पर विनाश का यह सिलसिला तुरंत बंद हो।
जैसे-जैसे समय बीत रहा है, आंदोलन को जनसमर्थन बढ़ता जा रहा है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों ने भी युवाओं के सुर में सुर मिलाया है। सामूहिक हस्ताक्षरों के साथ सौंपे गए ज्ञापन इस बात का प्रमाण हैं कि यह मुद्दा अब व्यक्तिगत न रहकर एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। प्रशासन के लिए अब और अधिक समय तक चुप्पी साधे रखना संभव नहीं होगा।
अंततः, यह पूरा घटनाक्रम हमारे तंत्र की विफलताओं को उजागर करता है। जहां एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें करती है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि एक पूरी नदी का गला घोंटा जा रहा है। यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो केवई नदी का यह ‘जल सत्याग्रह’ व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ी क्रांति का रूप ले सकता है।
फिलहाल,खबर लिखे जाने तक आंदोलनकारी युवा नदी के शीतल जल में खड़े होकर अपनी तपस्या जारी रखे हुए हैं। उनकी नजरें अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या शासन जनभावनाओं का सम्मान करेगा या माफिया राज के आगे नस्तक रहेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।