अनूपपुर। जिला मुख्यालय स्थित आशीर्वाद चिकित्सालय में जो कुछ हुआ, वह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे इंसानी जिंदगियों के साथ किया जा रहा एक खौफनाक खिलवाड़ है। जब गंभीर रूप से बीमार मरीज जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे, तब अस्पताल में कोई योग्य डॉक्टर मौजूद तक नहीं था। इलाज के नाम पर हो रहे इस तमाशे की परिणति आखिरकार एक बेबस महिला की जान जाने के रूप में सामने आई।
स्वास्थ्य विभाग की टीम जब इस ‘इलाज के अड्डे’ पर पहुंची, तो जो हकीकत उजागर हुई वह रोंगटे खड़े करने वाली थी। बिना डॉक्टर के मरीजों को भर्ती कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। महिला की दर्दनाक मौत के बाद जागे प्रशासन ने औचक कार्रवाई करते हुए अस्पताल को सील तो कर दिया है, लेकिन इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था की साख और निजी अस्पतालों की कार गुजारियों पर ऐसा तीखा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब हर कोई मांग रहा है।
छिल्पा निवासी महिला की मौत से भड़का आक्रोश
मामला दो दिन पूर्व का है जब छिल्पा निवासी फुलमत चौधरी को गंभीर स्थिति में आशीर्वाद चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। परिजनों को उम्मीद थी कि निजी अस्पताल में बेहतर इलाज मिलेगा, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वहां कोई डॉक्टर ही मौजूद नहीं है। बिना किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख के महिला का उपचार चलता रहा और आखिरकार लापरवाही के कारण उसकी सांसें थम गईं। महिला की मौत के बाद परिजनों के भारी आक्रोश और शिकायतों को संज्ञान में लेते हुए स्वास्थ्य विभाग की टीम हरकत में आई।
औचक निरीक्षण में खुली फर्जीवाड़े की पोल
रविवार को स्वास्थ्य विभाग की उच्चस्तरीय टीम ने आशीर्वाद अस्पताल पर औचक छापा मारा। निरीक्षण के दौरान अस्पताल परिसर में जो नजारा था, उसने अधिकारियों को भी सन्न कर दिया। कागजों पर ’24 घंटे चिकित्सा सेवा’ का दावा करने वाले इस अस्पताल में मौके पर एक भी योग्य चिकित्सक उपस्थित नहीं था। जांच में पाया गया कि बिना डॉक्टर की उपस्थिति के ही मरीजों को भर्ती किया जा रहा था और अप्रशिक्षित स्टाफ के भरोसे गंभीर बीमारियों का इलाज चलाया जा रहा था।
. गंभीर मरीजों को आनन-फानन में कराया गया शिफ्ट
छापेमारी के दौरान अस्पताल के वार्डों में 4 मरीज भर्ती पाए गए। इनमें से 2 मरीजों की हालत बेहद गंभीर थी और उनका इलाज बिना किसी डॉक्टर के चल रहा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए अधिकारियों ने बिना समय गंवाए दोनों गंभीर मरीजों को तत्काल एम्बुलेंस से जिला चिकित्सालय अनूपपुर में स्थानांतरित करवाया। वहीं सामान्य बीमारी से पीड़ित अन्य 2 मरीजों की प्राथमिक जांच के बाद उन्हें सुरक्षित घर भेज दिया गया।
. मानकों की धज्जियां उड़ीं, अस्पताल सील
निरीक्षण के दौरान स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल के रिकॉर्ड, उपचार संबंधी दस्तावेजों, दवाइयों के स्टॉक और अग्निशमन व बायोमेडिकल वेस्ट संबंधी व्यवस्थाओं की गहनता से पड़ताल की। जांच में पाया गया कि अस्पताल का संचालन निर्धारित चिकित्सकीय और नैदानिक स्थापना मानकों के विपरीत किया जा रहा था। गंभीर खामियां सामने आने के बाद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ अलका तिवारी के निर्देशों पर अस्पताल को तत्काल प्रभाव से बंद कर सील कर दिया गया।
भारी पुलिस बल और आला अधिकारियों की मौजूदगी
इस पूरी दंडात्मक कार्रवाई के दौरान मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अलका तिवारी खुद मौके पर मौजूद रहीं। उनके साथ स्वास्थ्य विभाग के अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, विशेषज्ञ चिकित्सक और सुरक्षा के लिहाज से पर्याप्त पुलिस बल तैनात रहा। कार्रवाई के दौरान अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई भी संतोषजनक दस्तावेज या डॉक्टर की मौजूदगी का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
सवाल: क्या सिर्फ सील करना ही काफी है?
अनूपपुर की इस घटना ने एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले ऐसे संस्थानों पर सिर्फ ‘अस्पताल सील’ करने की कार्रवाई काफी है? जब कोई निजी अस्पताल बिना डॉक्टर के गंभीर मरीजों को भर्ती करता है, तो यह अनजाने में हुई भूल नहीं बल्कि संभावित हत्या जैसा अपराध है। क्या ऐसे अस्पतालों के संचालकों और प्रबंधन पर गैर-इरादतन हत्या का आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए? मात्र सीलिंग की कार्रवाई से कुछ समय बाद ये अस्पताल नए नाम या नए लाइसेंस के साथ फिर खुल जाते हैं।
. कठोर कानूनों और सख्त फैसलों की दरकार
स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर ‘मौत की दुकानें’ चलाने वाले सेंटरों पर जब तक कठोर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर विराम नहीं लग सकता। जनता की मांग है कि इस मामले में न केवल आशीर्वाद अस्पताल का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किया जाए, बल्कि मृतका के परिवार को मुआवजा दिलाने के साथ-साथ दोषी संचालकों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए। अनूपपुर का यह मामला पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चेतावनी है कि निजी अस्पतालों की मॉनिटरिंग में ढिलाई किस तरह इंसानी जिंदगियों पर भारी पड़ सकती है।








