प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी ‘समग्र शिक्षा अभियान’: अंतिम किश्त के अभाव में तिल-तिल तड़प रहे शिक्षक और वेंडर,
अनूपपुर। कारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई किस कदर प्रशासनिक तंत्र को खोखला कर रही है, इसका सबसे घिनौना उदाहरण ‘समग्र शिक्षा अभियान’ के तहत दर्ज प्रकरणों में देखने को मिल रहा है। जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग आखिरकार सीएम हेल्पलाइन में आई शिकायतों की तह तक जाने से क्यों कतरा रहे हैं? शिकायतकर्ताओं और पीड़ित शिक्षकों को न्याय देने के बजाय विभागीय अधिकारी केवल लीपापोती और गोलमोल जवाबों के सहारे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। जो नवीन डी.पी.सी. कुर्सी पर बैठे हैं, अगर वे शिकायतकर्ताओं को प्रताड़ित करने और टालमटोल रवैया अपनाने के बजाय स्वयं अपने ही कार्यालय की कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कर लें, तो पूरी व्यवस्था में पसरी दीमक और कमीशनखोरी का नंगा सच उजागर होते देर नहीं लगेगी।
यह केवल एक प्रशासनिक सुस्ती का मामला नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित शोषण का तंत्र है, जहाँ निर्माण कार्य पूरे हो जाने के बावजूद अंतिम भुगतान रोककर आम लोगों, शिक्षकों और स्थानीय विक्रेताओं को आर्थिक तथा मानसिक रूप से तोड़ा जा रहा है। जब अंतिम किश्त जारी नहीं होती, तो दुकानदारों, मजदूरों, वेल्डरों और पेंटरों के बकाए का भुगतान अटक जाता है। कर्जदारों के तकादों और मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर जब पीड़ित व्यक्ति मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर न्याय की गुहार लगाता है, तो विभाग समस्या का समाधान करने के बजाय उल्टा उसी को प्रताड़ित करने और नोटिस थमाने में जुट जाता है। शिक्षा विभाग के दफ्तरों में बैठकर भ्रष्टाचार का खेल खेलने वाले अफसरों की इस अकर्मण्यता पर अब तीखे सवाल उठना लाजमी हैं।
निर्माण कार्यों की स्वीकृति से लेकर ले-आउट तक नियमों की अनदेखी का पहला अध्याय
समग्र शिक्षा अभियान के अंतर्गत जिला शिक्षा केंद्र अनूपपुर द्वारा उपयंत्रियों द्वारा तैयार किए गए प्रस्तावों के आधार पर विभिन्न निर्माण कार्यों को स्वीकृति प्रदान की गई। स्वीकृत निर्माण कार्यों की तकनीकी स्वीकृति और प्रशासनिक स्वीकृति विभाग द्वारा विधिवत जारी की गई थी। कागजों पर सब कुछ नियमों के मुताबिक दिखाने का नाटक किया गया, लेकिन शुरुआत से ही प्रक्रिया में पारदर्शिता की बलि दे दी गई ताकि बाद में मनमाने तरीके से भुगतान अटकाकर कमीशन का खेल खेला जा सके।
जीएसटी और अनुबंध में जानबूझकर रखी गई अनभिज्ञता और घालमेल
उपयंत्रियों द्वारा संबंधित शालाओं और शिक्षकों को निर्माण कार्य की कुल राशि एवं जीएसटी की राशि बताकर बजट की स्वीकृति तो दे दी गई, परंतु जीएसटी के लिखित व मौखिक नियमों के बारे में शिक्षकों को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि नियमानुसार जो अनुबंध किया जाना चाहिए था, वह कराया ही नहीं गया। बिना स्पष्ट अनुबंध के कार्य शुरू करा देना यह साफ दर्शाता है कि विभागीय मंशा शुरू से ही संदिग्ध थी ताकि आगे चलकर तकनीकी पेच फंसाकर लोगों को ब्लैकमेल किया जा सके।सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वर्तमान सी ई ओ जिला पंचायत अर्चना कुमारी के आने के पूर्व कभी भी जिला शिक्षा केंद्र द्वारा शिक्षकों को जी एस टी नंबर लेने के लिए कोई पत्र जारी नहीं किया गया
ले-आउट और प्रथम-द्वितीय किश्त में ‘कमीशन का गणित’
उपयंत्री द्वारा ले-आउट जारी किया गया, कार्य चालू हुआ और पहली किश्त जारी कर दी गई। इसके बाद शुरू हुआ कमीशन का खेल! आरोपों के मुताबिक, उपयंत्री की अनुशंसा पर दूसरी किश्त तभी जारी की गई जब उनके ‘कमीशन’ का हिसाब चुकता किया गया। यानी बिना चढ़ावे के सरकारी पैसा जारी न करने की मानसिकता ने शिक्षा जैसे पवित्र विभाग को भी दलदल में धकेल दिया। जो अधिकारी निर्माण कार्य की गुणवत्ता देखने के जिम्मेदार थे, वे केवल अपना कट तय करने में व्यस्त रहे।
काम पूरा होने के बावजूद अंतिम मूल्यांकन पर क्यों लटकाया गया भुगतान?
जब निर्माण कार्य पूरी तरह संपन्न हो गया, तो उपयंत्रियों द्वारा अंतिम मूल्यांकन कर फाइल जमा करा दी गई। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि अंतिम मूल्यांकन राशि का भुगतान भी पूरी तरह उपयंत्री और संबंधित अधिकारियों के ‘कमीशन’ पर ही निर्भर कर दिया गया। जब तक संबंधितों की जेबें गरम नहीं हुईं, तब तक फाइल को आगे नहीं बढ़ाया गया। नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2022-23 में स्वीकृत निर्माण कार्यों की अंतिम किश्त आज दिनांक तक अप्राप्त है और भुगतान अधर में अटका हुआ है।
लेनदारों के तकादे और सी एम हेल्पलाइन लगाने की ‘मजबूरी’
अंतिम किश्त का भुगतान न मिलने के कारण स्थानीय दुकानदार, मजदूर, वेल्डर और पेंटर अपनी मजदूरी और सामग्री के पैसे के लिए शिक्षकों और प्रभारियों का जीना दूभर कर रहे हैं। लेनदार रोजाना दरवाजे पर आकर जलील कर रहे हैं। इस असहनीय मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर जब पीड़ित शिक्षक ने विभागीय जनसुनवाई और आवेदनों पर कोई सुनवाई न होने के बाद सीएम हेल्पलाइन पर प्रकरण दर्ज कराया, तो विभाग ने समस्या हल करने के बजाय शिकायतकर्ता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
उपयंत्री स्वयं बने ठेकेदार और अपनी ही नाम जारी किए चेक!
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और सनसनीखेज सच यह है कि कई जगहों पर उपयंत्री स्वयं ही ठेकेदार बन गए और सामग्री सप्लाई के नाम पर फर्जीवाड़ा किया। दबे शब्दों में यह जानकारी भी छनकर आ रही है कि उपयंत्रियों ने अपने खुद के नाम पर कमीशन और सामग्री के चेक तक कटवाए हैं। जो अधिकारी पर्यवेक्षक थे, वे खुद सप्लायर और ठेकेदार बनकर मलाई खाते रहे और विभाग में बैठे जिम्मेदार अफसर आंखें मूंदकर तमाशा देखते रहे।
उच्च अधिकारियों से सीधी मांग: कमीशनखोरी का हो पर्दाफाश और मिले न्याय!
अब समय आ गया है कि वरिष्ठ अधिकारी और जिला प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागें। वर्ष 2022-23 से लेकर वर्ष 2025-26 तक स्वीकृत निर्माण कार्यों की अंतिम किश्त जारी न होने के विषय में अपने मातहत कर्मचारियों और उपयंत्रियों से कड़ाई से सवाल-जवाब करें। शिकायतकर्ताओं को प्रताड़ित करने के बजाय, स्वयं निष्पक्ष होकर जांच करें, पीड़ितों की मानसिक पीड़ा का अंत करें और वर्षों से चल रहे इस संगठित ‘कमीशन के खेल’ का पर्दाफाश कर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजें।
इनका कहना है
जी एस टी जमा करने के पश्चात अंतिम किश्त का भुगतान किया जाएगा यदि किसी उपयंत्री ने अपने खाते में पैसा लिया हैं तो यह गलत है
प्रदीप पांडे,सहायक यंत्री ,सर्व शिक्षा अभियान, अनुपपुर
सभी स्कूल के जी एस टी नंबर बनाने के आदेश दिए गए हैं यदि किसी उपयंत्री ने अपने खाते में पैसा लिया है तो यह गलत है जांच उपरांत कार्यवाही की जाएगी
संजय कुमार मिश्रा,जिला परियोजना समन्वयक,
सर्व शिक्षा अभियान अनुपपुर








