
अनूपपुर में कनिष्ठ उपयंत्री को नियमों के खिलाफ सौंपा गया सहायक यंत्री का प्रभार, वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप
अनूपपुर। मध्य प्रदेश शासन के नियम-निर्देश और शासन के आदेश अधिकारियों की मेहरबानी के आगे कितने बौने साबित हो सकते हैं, इसका जीता-जागता प्रमाण जिला अनूपपुर के ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग और जिला पंचायत कार्यालय में देखने को मिल रहा है। जहां शासकीय निर्देशों और न्यूनतम सेवा अवधि के स्पष्ट मापदंडों को दरकिनार करते हुए चहेतों को उपकृत करने का खेल खुलेआम खेला जा रहा है। प्रशासनिक सुचिता और वरिष्ठता की मर्यादा को ताक पर रखकर जारी किए गए एक ताजा आदेश ने पूरे जिले में हलचल पैदा कर दी है, जहां नियमों की बलि चढ़ाकर एक कनिष्ठ उपयंत्री को सहायक यंत्री जैसे जिम्मेदार पद का प्रभार सौंप दिया गया है।
राज्य शासन के स्पष्ट दिशा-निर्देशों में दर्ज है कि सहायक यंत्री का प्रभार देने के लिए कनिष्ठ अधिकारी की न्यूनतम सेवा अवधि का मानक क्या होना चाहिए, लेकिन अनूपपुर में ‘मेहरबानी’ का आलम यह है कि 8 साल की अनिवार्य सेवा अवधि पूरी न होने के बावजूद नियम-कायदों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। उस क्षेत्र और संभाग में कई ऐसे वरिष्ठ उपयंत्री मौजूद हैं जो वर्षों से अपनी निष्ठापूर्ण सेवाएं दे रहे हैं और प्रभार के वैध हकदार थे, लेकिन उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर ‘सुश्री महत्वाकांक्षी सिंह’ को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई। सवाल उठ रहा है कि क्या अब कलेक्टर कार्यालय और जिला पंचायत के आदेश शासकीय नियमों से भी ऊपर हो चुके हैं?
राज्य रोजगार गारंटी परिषद का स्पष्ट आदेश
मामला मध्य प्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद, भोपाल द्वारा जारी आदेश क्रमांक/2086/स्था/NR-2/मनरेगा/2025 (दिनांक 02/09/2025) से जुड़ा हुआ है। इस आदेश के बिंदु क्रमांक 2(1) में प्रमुख अभियंता (ग्रामीण यांत्रिकी सेवा) एवं आयुक्त (म.प्र. राज्य रोजगार गारंटी परिषद) के संयुक्त हस्ताक्षरों से स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि मनरेगा योजनांतर्गत सहायक यंत्री के रिक्त पदों पर प्रभार केवल जिले में पदस्थ वरिष्ठ उपयंत्री को ही दिया जाएगा। इसके लिए स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि “डिग्रीधारी उपयंत्री हेतु 08 वर्ष एवं डिप्लोमाधारी उपयंत्री हेतु 10 वर्ष से कम सेवा अवधि के उपयंत्रियों को प्रभार नहीं दिया जावे।”
नियुक्ति तिथि और सेवा अवधि की कड़वी सच्चाई
शासकीय अभिलेखों और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, उपयंत्री सुश्री महत्वाकांक्षी सिंह की सेवा में स्थायी नियुक्ति/सेवा तिथि 18 मार्च 2019 (18.03.2019) दर्ज है। गणित बिल्कुल साफ है—वर्ष 2019 से लेकर वर्तमान वर्ष 2026 तक उनकी कुल सेवा अवधि बमुश्किल 7 वर्ष के आसपास ही पहुंचती है। यानी शासन द्वारा तय की गई अनिवार्य 08 वर्ष की न्यूनतम सेवा अवधि का मापदंड किसी भी सूरत में पूरा नहीं होता। इसके बावजूद जिला प्रशासन अनूपपुर ने शासन के इस बाध्यकारी आदेश की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
कलेक्टर कार्यालय से जारी हुआ विवादित आदेश
कार्यालय कलेक्टर (पंचायत) जिला अनूपपुर (म.प्र.) द्वारा मनरेगा योजनांतर्गत क्लस्टर निर्धारण का हवाला देते हुए जारी आदेश में कनिष्ठ उपयंत्री सुश्री महत्वाकांक्षी सिंह (उपयंत्री, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग अनूपपुर) को जनपद पंचायत पुष्पराजगढ़ के सेक्टर- किरगी, गिरवी, दमेहड़ी, मेजरी, खाटीखाटी एवं अमगंवा के साथ-साथ “सेक्टर अंतर्गत जनपद पंचायत जैतहरी के प्रभार से मुक्त करते हुए अपने कार्य के साथ-साथ सहायक यंत्री का प्रभार” सौंप दिया गया। इस आदेश के जारी होते ही विभागीय गलियारों में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की चर्चाएं गर्म हो गई हैं।
वरिष्ठ उपयंत्रियों के अधिकारों पर डाका
अनूपपुर जिले और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग में कई ऐसे वरिष्ठ उपयंत्री पदस्थ हैं जिनकी सेवा अवधि 8 से 10 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वे नियमानुसार सहायक यंत्री के प्रभार के सर्वथा योग्य थे। लेकिन वरिष्ठता सूची और पात्रता के मानकों को ठेंगे पर रखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों को अनदेखा कर दिया गया। विभागीय कर्मचारियों एवं जनप्रतिधियों का कहना है कि जब वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे, तो नियमों को ताक पर रखकर एक कनिष्ठ उपयंत्री पर इतनी दरियादिली क्यों दिखाई गई?
दोहरे प्रभार और कार्य व्यवस्था पर उठे सवाल
राज्य सरकार के 2 सितंबर 2025 के निर्देश पत्र के बिंदु 2(2) में यह भी स्पष्ट लिखा गया है कि “उपयंत्री के रूप में कार्य संपादन पूरी तरह से निषिद्ध रहेगा। किसी भी दशा में दोनों प्रभार एक ही व्यक्ति के पास नहीं होना चाहिए।” किंतु अनूपपुर से जारी आदेश में साफ लिखा गया है कि वे “अपने कार्य के साथ-साथ” सहायक यंत्री का प्रभार संभालेंगी। यह सीधे तौर पर राज्य शासन के भोपाल से जारी आदेश का खुला उल्लंघन और अवमानना है।
प्रशासनिक तानाशाही या मनमानी की पराकाष्ठा?
जब भोपाल स्तर से प्रमुख अभियंता और आयुक्त स्तर के अधिकारी लिखित में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करते हैं, तो जिला स्तर पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी उन निर्देशों को नजरअंदाज कैसे कर सकते हैं? अनूपपुर में हुआ यह आदेश इस बात का पुख्ता सबूत है कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारी अपनी मनमानी चलाने में इतने बेखौफ हो चुके हैं कि उन्हें राज्य सरकार के नियमों और आदेशों की कोई परवाह नहीं रह गई है।
मनरेगा व विकास कार्यों की गुणवत्ता पर खतरा
सहायक यंत्री का पद तकनीकी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा होता है। मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना में करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की तकनीकी स्वीकृति, मूल्यांकन और निगरानी का जिम्मा इसी पद पर होता है। अपरिपक्व और निर्धारित अनुभव न रखने वाले अधिकारियों को नियम विरुद्ध प्रभार देने से न केवल कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित होगी, बल्कि सरकारी खजाने के दुरुपयोग की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
निष्पक्ष जांच और आदेश निरस्तीकरण की मांग
नियम विरुद्ध दिए गए इस प्रभार के बाद अब मामले में शासन स्तर से उच्चस्तरीय जांच की मांग उठने लगी है। पीड़ित और वरिष्ठ उपयंत्रियों में भारी रोष व्याप्त है। मांग की जा रही है कि भोपाल में बैठे प्रमुख अभियंता ग्रामीण यांत्रिकी सेवा तथा आयुक्त राज्य रोजगार गारंटी परिषद तत्काल इस मामले का संज्ञान लें, जिला प्रशासन अनूपपुर द्वारा जारी इस नियम विरुद्ध आदेश को तुरंत निरस्त करें और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए ताकि प्रशासनिक तंत्र में नियमों की गरिमा बनी रहे।








