अनूपपुर का ‘जल-संकट’: केवई नदी को निजी कंपनी के हवाले करने की साज़िश; ग्रामीणों ने जनसुनवाई को बताया ‘प्रशासनिक मिलीभगत’ का खेल
कोतमा, अनूपपुर: मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में केवई नदी का अस्तित्व अब एक निजी कंपनी के व्यावसायिक हितों की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। मेसर्स अनूपपुर थर्मल एनर्जी लिमिटेड द्वारा नदी के प्राकृतिक बहाव को रोककर 10 कंक्रीट के एनीकट और विशाल जलाशय बनाने की परियोजना के खिलाफ स्थानीय निवासियों का आक्रोश फूट पड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन इस विनाशकारी परियोजना को वैध जामा पहनाने के लिए सारी मर्यादाएं लांघकर जनसुनवाई आयोजित कर रहा है, जबकि इस पूरे मामले में तथ्यों को छुपाने और सरकारी दस्तावेजों में जालसाजी का खेल चल रहा है।
यह जनसुनवाई न केवल स्थानीय जनता के जीवन अधिकारों पर सीधा हमला है, बल्कि यह केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्देशों का भी खुला उल्लंघन है, जो पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। अनुज गौतम और क्षेत्रवासियों ने मोर्चा खोलते हुए इसे ‘लोकतंत्र का उपहास’ करार दिया है और इस पूरी प्रक्रिया को तत्काल निरस्त करने की पुरजोर मांग की है।
पर्यावरण मंजूरी का खुला उल्लंघन और शर्तों की अनदेखी
परियोजना के लिए भारत सरकार के MoEF&CC द्वारा दी गई मूल पर्यावरण मंजूरी में स्पष्ट निर्देश थे कि केवई नदी के प्राकृतिक बहाव को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा और तटों पर ‘ग्रीन बेल्ट’ का निर्माण होगा। अब नदी पर 10 पक्के एनीकट बनाकर इसके बहाव को अवरुद्ध करना मूल शर्तों का सीधा उल्लंघन है। जनता का सवाल है कि मूल EC के रहते हुए दूसरी EC की प्रक्रिया कैसे शुरू की जा रही है?
पारदर्शिता का अभाव: EIA और SIA रिपोर्ट तक पहुंच नहीं
लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत जनसुनवाई से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन और सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए थी। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि 19 जून को SDM कार्यालय में पूछने पर अधिकारियों ने रिपोर्ट होने से ही इनकार कर दिया। सूचना छुपाकर की जा रही यह जनसुनवाई प्रशासनिक साठगांठ का स्पष्ट प्रमाण है।
अवैध निर्माण को वैधता देने का हथकंडा
नियमानुसार, अंतिम EC और जनसुनवाई के बिना भौतिक निर्माण असंभव है, फिर भी कंपनी ने नदी पर एनीकट का अवैध निर्माण पहले ही कर लिया है। प्रशासन द्वारा बार-बार शिकायत के बावजूद इस पर कार्रवाई न करना यह साबित करता है कि आज की जनसुनवाई का एकमात्र उद्देश्य कंपनी के पुराने अवैध कार्यों को ‘वैध’ घोषित करना है।
जल आवंटन में भारी धोखाधड़ी
कंपनी ने केंद्र सरकार से EC प्राप्त करने के लिए सोन नदी से 56 मिलियन घन मीटर जल आवंटन का एग्रीमेंट दिखाया था। अब वे केवई नदी पर कब्जा कर रहे हैं। यह मूल EC के समय दिल्ली में प्रस्तुत किए गए तथ्यों को छुपाने और मंत्रालय को गुमराह करने का गंभीर मामला है।
4 साल के अस्थायी अनुबंध का स्थायी कब्जा
WRD के साथ कंपनी का जल आवंटन अनुबंध मात्र 4 वर्ष के लिए है। इस अल्पकालिक अनुबंध की आड़ में नदी पर पक्के निर्माण करना भविष्य में पूरी नदी को कंपनी के लिए बंधक बनाने की सुनियोजित साजिश है।
भारत सरकार के निर्देशों की अवहेलना
जल शक्ति मंत्रालय ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। जब मामला मंत्रालय के संज्ञान में और प्रक्रियाधीन है, तो स्थानीय स्तर पर जनसुनवाई आयोजित करना भारत सरकार की अवहेलना और गंभीर प्रशासनिक कदाचरण की श्रेणी में आता है।
अनुच्छेद 21: 1 लाख आबादी के जीवन का सवाल
कोतमा नगरपालिका और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल व्यवस्था केवई नदी पर टिकी है। प्रशासन का यह कहना कि “आप प्रभावित नहीं हैं,” संवैधानिक अधिकारों का हनन है। 1 लाख लोगों की प्यास बुझाने वाली नदी को निजी कंपनी को सौंपना अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीने के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
8. दिल्ली मंत्रालय के साथ जालसाजी
कंपनी ने EAC के समक्ष सत्यता का वचन पत्र दिया था। जानबूझकर सोन नदी का आवंटन दिखाकर केवई नदी के गुप्त अनुबंध को छुपाना सुप्रीम कोर्ट के ‘हनुमान लक्ष्मण आरोसकर’ मामले के सिद्धांतों के विपरीत है, जहां तथ्य छुपाने पर EC को शून्य घोषित किया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की अनदेखी
सुप्रीम कोर्ट ने गोवा मोपा एयरपोर्ट केस में स्पष्ट किया था कि परियोजना प्रस्तावक को ‘पूर्ण प्रकटीकरण’ करना होगा। मेसर्स अनूपपुर थर्मल एनर्जी लिमिटेड ने जो चालाकी बरती है, उसके बाद उनकी मूल EC तत्काल निरस्त होने योग्य है।
प्रशासन के लिए अंतिम चेतावनी
स्थानीय निवासियों ने प्रशासन को आगाह किया है कि यदि यह जनसुनवाई निरस्त नहीं की गई, तो वे सभी दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ माननीय राष्ट्रीय हरित अधिकरण और माननीय उच्च न्यायालय की शरण लेने के लिए विवश होंगे। प्रशासन को तत्काल ‘स्टॉप वर्क ऑर्डर’ जारी कर कंपनी पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए।
क्या स्थानीय प्रशासन जनहित को निजी मुनाफे से ऊपर रखते हुए इस विवादित जनसुनवाई को निरस्त करेगा, या फिर जनता का यह संघर्ष अदालती गलियारों तक पहुँचेगा?








