अनूपपुर में ‘लामाटोला कोल ब्लॉक’ का मुद्दा: जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
अनूपपुर: मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में प्रस्तावित ‘लामाटोला कोल ब्लॉक’ परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश उबल पड़ा है। 1030 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली मेसर्स एसीसी लिमिटेड की यह परियोजना अब एक गंभीर औद्योगिक विवाद का रूप ले चुकी है, जहाँ स्थानीय निवासियों का अस्तित्व ही दांव पर लगा है। क्षेत्र के ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों की रहस्यमयी चुप्पी और प्रशासन की संदिग्ध कार्यप्रणाली को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
जनहित बनाम औद्योगिक स्वार्थ: एक गहरा संकट
यह परियोजना केवल भूमि अधिग्रहण का मामला नहीं है, बल्कि यह करीब 3000 से अधिक लोगों की आजीविका और संस्कृति पर सीधा प्रहार है। परियोजना के तहत 304 हेक्टेयर वन भूमि और 585 हेक्टेयर उपजाऊ कृषि भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है। प्रभावित ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी जीवन रेखा, यानी उनकी जमीन छीनने की साजिश रची जा रही है, जबकि कंपनी और प्रशासन इसे एक सामान्य प्रक्रिया बताकर गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर संशय के बादल
जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने अपना रक्षक और आवाज बनाकर सदन में भेजा था, वे आज इस संकट की घड़ी में मूकदर्शक बने हुए हैं। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई तथाकथित दिग्गज नेता पर्दे के पीछे से कंपनी के ‘दलाल’ के रूप में काम कर रहे हैं। चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े वादे करने वाले ये प्रतिनिधि आज कंपनी के हितों के सामने नतमस्तक नजर आते हैं, जिससे जनता में गहरा रोष व्याप्त है।
जनसुनवाई’ या ‘कागजी खानापूर्ति’?
लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत होने वाली ‘जनसुनवाई’ इस पूरे प्रकरण में केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने न तो उन्हें परियोजना की बारीकियों के बारे में सूचित किया और न ही एनवायर्नमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक कीं। दफ्तरों के दरवाजे प्रभावितों के लिए बंद हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन जनता की नहीं, बल्कि कंपनी के ‘पीआर मैनेजर’ की भूमिका में कार्य कर रहा है।
पारदर्शिता के अभाव में बढ़ रहा अविश्वास
प्रशासन द्वारा अपनाई गई गुप्त कार्यप्रणाली ने जनता और सरकार के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा कर दी है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो रिपोर्ट क्यों छिपाई जा रही है? पंचायत के मुखियाओं को भी विश्वास में न लेना इस बात का प्रमाण है कि परियोजना को जबरन लागू करने की कोशिश की जा रही है, जो पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है।
‘पुनर्वास नहीं होगा’ – तथ्यों के साथ खिलवाड़
कंपनी का यह दावा कि इस परियोजना में ‘पुनर्वास की आवश्यकता नहीं होगी’, ग्रामीणों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। 500 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि का अधिग्रहण किसी व्यक्ति के जीवनयापन के साधन को छीनना है। जब आजीविका का जरिया ही खत्म हो जाएगा, तो बिना उचित पुनर्वास के ग्रामीणों का भविष्य क्या होगा? यह दावा न केवल भ्रामक है, बल्कि यह कंपनी की संवेदनहीनता को भी प्रदर्शित करता है।
पर्यावरण सुरक्षा के दावे हवा-हवाई
परियोजना के तहत ‘ग्रीन बेल्ट’ और ‘पर्यावरण सुरक्षा’ के जो दावे किए जा रहे हैं, वे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। 304 हेक्टेयर वन भूमि का विनाश स्थानीय इको-सिस्टम को अपूरणीय क्षति पहुँचाएगा। ग्रामीणों का तर्क है कि जब पंचायत स्तर पर किसी भी प्रकार की सहमति नहीं ली गई है, तो पर्यावरण को बचाने का दिखावा महज फाइलों को तेजी से मंजूरी दिलाने की एक चाल भर है।
ग्रामीणों की चेतावनी: आर-पार की लड़ाई
“जानकारी नहीं, तो सुनवाई कैसी?” – यह नारा अब पूरे अनूपपुर में एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। ग्रामीणों ने प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनके हितों की अनदेखी कर एकतरफा कार्यवाही जारी रखी गई, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे अपने पुरखों की जमीन और भविष्य को किसी भी कीमत पर कंपनी के हाथों बिकने नहीं देंगे।
लोकतंत्र का हनन और जवाबदेही का सवाल
यह मामला केवल लामाटोला कोल ब्लॉक का नहीं, बल्कि अनूपपुर में लोकतंत्र की मर्यादा का है। क्या चुनी हुई सरकारें जनता की सेवा के लिए हैं या औद्योगिक घरानों की राह आसान करने के लिए? अब समय आ गया है कि उन जनप्रतिनिधियों के चेहरों को बेनकाब किया जाए जो जनता का गला घोंटकर अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ साध रहे हैं।
### भविष्य की आहट: विनाश या विकास?
अंततः, यह ‘विकास’ आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाश की इबारत लिख सकता है। यदि समय रहते प्रशासन ने अपनी निष्पक्षता साबित नहीं की और जनप्रतिनिधियों ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया, तो यह क्षेत्र एक बड़े सामाजिक विद्रोह का केंद्र बनेगा। जनता अब जागरूक हो चुकी है और वे अपने हक के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं।
क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी के पीछे का सच सामने आ पाएगा, और क्या प्रशासन ग्रामीणों के विरोध को दरकिनार कर अपनी मनमानी जारी रखेगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।








