विकास की बलिवेदी पर अपनों की ज़मीन और परायों का मुनाफ़ा

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विकास की बलिवेदी पर अपनों की ज़मीन और परायों का मुनाफ़ा: अनूपपुर में कोयला खदान के ‘भूमिदाता’ मज़दूरों का दर्द और प्रशासन की बेरुखी
पं अजय मिश्र
अनूपपुर जिस माटी को सींचकर पीढ़ियों ने अनाज उगाया, देश के विकास और ऊर्जा की भूख मिटाने के लिए जब उसी उपजाऊ पैतृक ज़मीन को सौंपने की बारी आई, तो अनूपपुर ज़िले के कोतमा तहसील अंतर्गत ग्राम बसखला और ठोडहा के सीधे-सादे आदिवासियों और किसानों ने सहर्ष अपनी धरती मां की बलि दे दी। उन्हें उम्मीद थी कि कल जब इस ज़मीन के सीने को चीरकर ‘काला सोना’ निकलेगा, तो उनके घरों में भी खुशहाली का उजाला फैलेगा। मगर अफ़सोस, आज हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। देश को रोशन करने वाले ये भूमिदाता श्रमिक खुद जे.एम.एस. माइनिंग कंपनी के शोषण के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं, जहाँ उनकी ही ज़मीनों से भारी मुनाफ़ा कमाने वाला प्रबंधन अब उनके अधिकारों और सम्मान को पैरों तले रौंद रहा है।
इस पूरे मानवीय और आर्थिक शोषण के खेल में स्थानीय ज़िला प्रशासन की भूमिका सबसे ज़्यादा निराश करने वाली और संदेहास्पद रही है। प्रभावित किसानों और विस्थापित मज़दूरों ने अपनी व्यथा लेकर कलेक्टर से लेकर अनुविभागीय दंडाधिकारी कोतमा तक के चक्कर काटे। लगातार प्रशासनिक चौखट पर गुहार लगाई गई, लेकिन प्रशासन केवल तारीखों का झुनझुना थमाता रहा। एसडीएम कोर्ट ने कंपनी प्रबंधन को 27 मई 2026 को जवाब के साथ हाजिर होने का निर्देश तो दे दिया, लेकिन इस बीच तानाशाह प्रबंधन ने मज़दूरों की आवाज़ को कुचलने के लिए दमनकारी रास्ते चुन लिए। प्रशासन मूकदर्शक बना रहा और उसकी नाक के नीचे एक बाहरी निजी कंपनी ने स्थानीय नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का मज़ाक बना दिया।
मज़दूरों का यह दर्द केवल आज का नहीं है, बल्कि यह एक विधिक और ऐतिहासिक धोखाधड़ी की लंबी दास्तान है। इन गरीब किसानों की बहुमूल्य ज़मीन का अधिग्रहण साल 2013 में बेहद मामूली दरों पर किया गया था। ‘उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम, 2013’ की मूल भावना कहती है कि यदि 5 वर्षों तक काम शुरू न हो, तो मुआवजे की पुनर्गणना होनी चाहिए। लेकिन यहाँ 13 साल पुराने रेट पर ज़मीन हड़प ली गई। हद तो तब हो गई जब कंपनी ने 30 मार्च 2022 को लिखित शपथ-पत्र देकर वादा किया था कि वह मध्य प्रदेश की आदर्श पुनर्वास नीति के तहत नियमित श्रेणी का रोज़गार और लाभ देगी, मगर आज कंपनी इस वैधानिक वादे से साफ़ मुकर चुकी है। ₹3 लाख सालाना के मामूली टुकड़े फेंककर कंपनी इन श्रमिकों से भूमिगत खदानों में जानलेवा काम करा रही है।
शोषण की पराकाष्ठा यहीं ख़त्म नहीं होती। कंपनी के भीतर ‘समान कार्य-समान वेतन’ के सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांत की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जान जोखिम में डालकर कई सौ मीटर नीचे सुरंगों में काम करने वाले इन मज़दूरों को न तो कोई जोखिम भत्ता दिया जाता है, और न ही खान अधिनियम के तहत साप्ताहिक या राष्ट्रीय अवकाश का पैसा मिलता है। पिछले 3 सालों से बोनस डकार लिया गया है और वास्तविक सकल वेतन को छुपाकर पीएफ और ग्रेच्युटी में भी वित्तीय हेरफेर की जा रही है। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जहरीली गैसों और कोयले की धूल के बीच काम करने वाले इन विस्थापितों के पास न तो कोई ढंग की चिकित्सा सुविधा है और न ही सुरक्षा उपकरण । मानो कंपनी ने इन्हें केवल अपनी तिजोरियां भरने का एक साधन समझ लिया हो।
इस घोर अन्याय के ख़िलाफ़ जब इन सीधे-सादे मज़दूरों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ बुलंद की और 3 मई 2026 को गेट पर बैठे, तो प्रबंधन ने 7 दिनों के भीतर वेतन पुनरीक्षण का लिखित आश्वासन दिया था। लेकिन पूंजीपतियों की फितरत के अनुसार, वे अपने ही हस्ताक्षरित वादे से मुकर गए। जब मज़दूरों ने विवश होकर 27 मई 2026 से शांतिपूर्ण धरने की पूर्व सूचना दी, तो कंपनी ने क्रूरता और तानाशाही की सारी हदें पार करते हुए 25 मई को एक नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में इन गरीब श्रमिकों को ‘एस्मा लगाने, नौकरी से निकालने, सस्पेंड करने और एक दिन की हड़ताल के बदले सात दिन का वेतन काटने की गैर-कानूनी धमकियां दी गईं।
अतः, अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अपनी माटी के हक और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए समस्त भू-विस्थापित श्रमिकों और ग्रामीणों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। अपनी 17-सूत्रीय जायज मांगों को लेकर 27 मई की सुबह से उरतन एवं उरतन नॉर्थ कोल माइन परियोजना के मुख्य द्वार पर “काम बंद – जमीन वापस, शोषित ओवरटाइम बंद, गांव का विकास नहीं तो खदान नहीं” के अटूट संकल्प के साथ अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू हो रहा है। भावुक कर देने वाली बात यह है कि इस धरने में मज़दूर अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार—महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और मवेशियों के साथ बैठने को विवश हैं। अब देखना यह होगा कि क्या ज़िला प्रशासन इस संवेदनशील मामले में अपनी गहरी नींद से जागकर इन गरीब भूमिदाताओं को न्याय दिलाता है, या फिर पूंजीपतियों के इस दमनचक्र को मूक सहमति देता रहेगा।