जल गंगा संवर्धन योजना की उड़ी धज्जियां, तालाब को राखड़ से पाट दिया

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आर्या एनर्जी की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
ताक पर पर्यावरण कानून
बगैर सीटीओ जारी राखड का खेल

ग्राम पंचायत लतार का मामला
अनूपपुर। मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी “जल गंगा संवर्धन योजना” के दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है, इसका एक घिनौना और जीता-जागता उदाहरण अनूपपुर जिले से सामने आया है। जनपद पंचायत अनूपपुर के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत लतार में जल संरक्षण के पवित्र अभियान का मखौल उड़ाते हुए एक जीवित तालाब को मौत के घाट उतारने की साजिश रची जा रही है। जिस जल निकाय को सहेजने और संवारने के लिए लाखों रुपए पानी की तरह बहाए गए थे, आज उसी तालाब के सीने पर औद्योगिक कचरे (फ्लाई ऐश) की मोटी परत बिछाकर उसका अस्तित्व ही हमेशा के लिए मिटाया जा रहा है।
सरकारी दावों की खुली पोल, सुनियोजित तरीके से डंपिंग
मौके से सामने आईं तस्वीरें और जमीनी हालात जिला प्रशासन के उन बड़े-बड़े दावों की सरेआम पोल खोल रहे हैं, जिनमें जल स्रोतों के पुनरुद्धार की बात कही जाती है। तालाब के भीतर किसी चोर-छिपे नहीं, बल्कि खुलेआम बड़े-बड़े ढेरों में राखड़ (फ्लाई ऐश) उड़ेला जा रहा है। इस पूरी कवायद को देखकर यह साफ हो जाता है कि यह कोई अनजाने में की गई गलती नहीं, बल्कि एक जीवनदायी तालाब को पूरी तरह से डंपिंग यार्ड में तब्दील करने की बेहद सुनियोजित और गंभीर साजिश है। अब क्षेत्र में यह यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि आखिर किसकी शह और मिलीभगत से यह पर्यावरण विरोधी खेल बेखौफ होकर खेला जा रहा है?

गहरीकरण के नाम पर सीएसआर फंड की बर्बादी
इस पूरे मामले का एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह भी है कि इस तालाब को बचाने के लिए पहले प्रयास किए जा चुके थे। स्थल पर स्थापित आधिकारिक शिलालेख के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2023-24 में रिलायंस फाउंडेशन द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत इस तालाब का व्यापक गहरीकरण कराया गया था। जल संरक्षण के नाम पर किए गए इस कार्य का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के वाटर लेवल को बढ़ाना और ग्रामीणों को पानी की समस्या से निजात दिलाना था। लेकिन आज उसी गहरे किए गए तालाब में जहर भरा जा रहा है, जो सीधे तौर पर सरकारी प्रयासों और सीएसआर फंड के दुरुपयोग तथा बर्बादी की ओर इशारा करता है।

सरपंच-सचिव की सरपरस्ती में मैदान बनाने का खेल
एक तरफ जहां देश और प्रदेश में घटते भूजल स्तर को सुधारने के लिए नए तालाबों के निर्माण और पुराने तालाबों के जीर्णोद्धार पर जोर दिया जा रहा है, वहीं लतार ग्राम पंचायत के जिम्मेदार नुमाइंदे उल्टी गंगा बहा रहे हैं। आरोप है कि ग्राम पंचायत लाटर (लतार) के सरपंच, सचिव और कुछ रसूखदार पंचों के मौन संरक्षण में इस बड़े तालाब को समतल मैदान में बदलने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। तालाब को पाटने के लिए जिस इंडस्ट्रियल वेस्टेज का सहारा लिया जा रहा है, वह आने वाले समय में पूरी पंचायत के लिए एक ऐसा धीमा जहर साबित होगा जिसका खामियाजा पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।

आर्य एनर्जी पर नियमों को ताक पर रखने का सीधा आरोप
स्थानीय ग्रामीणों ने इस पूरे काले कारोबार को लेकर सीधे तौर पर पास में ही स्थित **आर्य एनर्जी पावर प्लांट** को कटघरे में खड़ा किया है। ग्रामीणों का साफ तौर पर कहना है कि पावर प्लांट से निकलने वाली खतरनाक फ्लाई ऐश (राखड़) को ट्रकों में भरकर यहां अवैध रूप से डंप किया जा रहा है। यह कृत्य न केवल पूरी तरह से गैरकानूनी है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (इकोलॉजी) के लिए एक गंभीर और अपूरणीय खतरा भी पैदा कर रहा है।

फ्लाई ऐश नियमों की सरेआम उड़ रही धज्जियां
पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार द्वारा ‘फ्लाई ऐश नोटिफिकेशन 2016’ (संशोधित 2021) लागू किया गया है। इन नियमों के तहत यह स्पष्ट और कड़े निर्देश हैं कि किसी भी परिस्थिति में फ्लाई ऐश को जल स्रोतों या उनके आसपास नहीं डाला जा सकता। इसका केवल वैज्ञानिक तरीके से ही निपटान अनिवार्य है और इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति आवश्यक होती है। परंतु लतार पंचायत में इन तमाम राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नियमों को पैरों तले कुचल दिया गया है और जिम्मेदार महकमे आंखें मूंदकर बैठे हैं।

हवा में घुलता जहर, सेहत पर मंडराया बड़ा खतरा
तालाब में नियमों का उल्लंघन कर खुले आसमान के नीचे डंप की जा रही यह राखड़ तात्कालिक रूप से पानी को तो नष्ट कर ही रही है, साथ ही यह हवा में भी जहर घोल रही है। वर्तमान में भीषण गर्मी का मौसम है और तेज चलने वाली हवाओं के कारण यह बारीक फ्लाई ऐश उड़कर आसपास के रिहायशी इलाकों और ग्रामीणों के घरों तक पहुंच रही है। सांस के जरिए फेफड़ों में बैठ रही यह राखड़ क्षेत्र के बच्चों और बुजुर्गों की सेहत के लिए एक बेहद गंभीर और जानलेवा संकट बन चुकी है, जिससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।

ग्राम पंचायत की संदेहास्पद चुप्पी और साठगांठ
लतार ग्राम पंचायत प्रशासन की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा संदेहास्पद और कटघरे में नजर आ रही है। ग्रामीणों का पूछना है कि बिना किसी ग्राम सभा के प्रस्ताव के, बिना किसी वैधानिक अनुमति और पारदर्शी प्रक्रिया के इतना बड़ा विनाशकारी काम पंचायत की नाक के नीचे कैसे संभव हो गया? क्या पंचायत को इसकी भनक नहीं थी, या फिर भारी वित्तीय साठगांठ के चलते जानबूझकर अपनी आंखें, कान और मुंह बंद कर लिए गए? आरोप लग रहे हैं कि पंचायत के जिम्मेदारों और आर्य एनर्जी के बीच गहरी सेटिंग है।

पर्यावरण विभाग के आला अधिकारियों पर भी मिलीभगत की उंगली
इस पूरे मामले में केवल स्थानीय पंचायत ही नहीं, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण विभाग के आला अधिकारी भी जांच के घेरे में आते हैं। नियमों की धज्जियां उड़ाकर पर्यावरण विरोधी कार्य किए जाने के बावजूद आर्य एनर्जी प्लांट पर आज तक किसी भी प्रकार की ठोस दंडात्मक कार्रवाई न होना, इस मिलीभगत की पुष्टि करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए मोटी तनख्वाह पाने वाले अधिकारी ही रसूखदारों के साथ मिलकर जल स्रोतों को नष्ट करने के इस घिनौने कृत्य में मूक साझीदार बने हुए हैं।

सिर्फ ‘फोटो-ऑप’ बनकर रह गई जल गंगा संवर्धन योजना
जिला प्रशासन भले ही रोजाना प्रेस नोट जारी कर और सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट कर “जल गंगा संवर्धन योजना” का बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार कर रहा हो, लेकिन लतार पंचायत का यह मामला यह साबित करने के लिए काफी है कि यह योजनाएं सिर्फ कागजों और ‘फोटो अपॉर्चुनिटी’ (फोटो खिंचवाने) तक ही सीमित हैं। जमीनी धरातल पर प्रशासनिक निगरानी पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। अब सबकी नजरें आगामी मानसून पर टिकी हैं; अगर इस बार तालाब में जलभराव नहीं हुआ, तो यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि प्रशासन की नाक के नीचे जल संरक्षण का सिर्फ तमाशा बनाया गया।

ग्रामीणों की हुंकार: अविलंब हटाया जाए राखड़, पूर्ववत हो तालाब
आक्रोशित ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है। उनकी जिला प्रशासन से बेहद स्पष्ट और न्यायसंगत मांग है कि नियमों की धज्जियां उड़ाकर तालाब में डाली गई पूरी फ्लाई ऐश को तत्काल प्रभाव से ग्राम पंचायत और आर्य एनर्जी पावर प्लांट के खर्चे पर वापस उठवाया जाए। तालाब को खोदकर पुनः उसकी मूल स्थिति में लाया जाए ताकि आने वाली बारिश का पानी उसमें जमा हो सके। अब देखना यह है कि इस गंभीर मामले के मीडिया में उजागर होने के बाद भी सोया हुआ जिला प्रशासन जागता है या फिर ‘जल गंगा संवर्धन योजना’ को इसी तरह कागजों की शोभा बनने के लिए छोड़ दिया जाता है।

इनका कहना है। 

पूर्व में भी इस कार्य को बंद कराया गया था अभी तत्काल मौके पर जनपद सीईओ को भेजकर दिखवाते है
अर्चना कुमारी
सीईओ जिला पंचायत अनुपपुर