खेल के मैदान पर ‘भ्रष्टाचार का फाइनल’: अनूपपुर में प्रतिभाओं की बलि और फर्जी खिलाड़ियों का ‘सलेक्शन’

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जिला क्रीड़ा अधिकारी पर फिर लगे आरोप
अनूपपुर। अनूपपुर के खेल गलियारों से एक ऐसी खबर निकलकर सामने आ रही है, जिसने खेल भावना को मैदान के बीचों-बीच ‘क्लीन बोल्ड’ कर दिया है। यह कहानी किसी मेडल की जीत की नहीं, बल्कि खेल विभाग की उस सड़ांध की है जहाँ पसीना बहाने वाले खिलाड़ी बाहर रह जाते हैं और अधिकारियों की फाइल में ‘कागजी शेर’ राष्ट्रीय खिलाड़ी बन जाते हैं। इस पूरे खेल के ‘अंपायर’ और मुख्य सूत्रधार के रूप में जिला क्रीड़ा अधिकारी खलील कुरैशी का नाम फिर से सुर्खियों में है।


गौरतलब है कि कुरैशी साहब के लिए विवादों से नाता कोई नई बात नहीं है; यह वही अधिकारी हैं जिन पर पूर्व में लाखों रुपए के शासकीय धन के गबन और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लग चुके हैं। उस दौरान भ्रष्टाचार की आंच इतनी तेज थी कि सहायक आयुक्त (जनजातीय कार्य विभाग) अनूपपुर द्वारा उन्हें बकायदा कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण तक मांगा गया था। लेकिन लगता है कि गबन के उन आरोपों ने उन्हें सुधारने के बजाय और अधिक ‘साहसी’ बना दिया है।
अब मामला केवल पैसों के हेरफेर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह खिलाड़ियों के भविष्य के साथ सीधे तौर पर की जा रही ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है। फुटबॉल और सेपक टेकरा जैसे खेलों में फर्जी खिलाड़ियों की फौज खड़ी कर, पहचान छिपाकर दूसरों को मैदान में उतारना और अपात्रों को राष्ट्रीय प्रमाण पत्र बांटना अब विभाग का नया ‘बिजनेस मॉडल’ बन चुका है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और चयन प्रक्रिया ‘बोली’ में तब्दील हो जाए, तो अनूपपुर की मिट्टी से निकलने वाले वास्तविक खिलाड़ियों का भविष्य अंधकारमय होना निश्चित है।

अनूपपुर खेल जगत में भ्रष्टाचार का बड़ा खुलासा
मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में खेल प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें बेहतर मंच प्रदान करने के बजाय, खेल विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का एक ऐसा भयावह जाल बुन लिया है, जिसने खेल भावना को पूरी तरह शर्मसार कर दिया है। जिला क्रीड़ा अधिकारी खलील कुरैशी पर यह गंभीर आरोप है कि उन्होंने अपने पद की गरिमा को ताक पर रखकर अपात्र व्यक्तियों को अनुचित लाभ पहुँचाया और जालसाजी के माध्यम से फर्जी सर्टिफिकेट बांटे। ताज़ा मामला फुटबॉल और सेपक टेकरा जैसी लोकप्रिय प्रतियोगिताओं में उजागर हुआ है, जहाँ स्थापित नियमों की अनदेखी कर ‘फर्जी खिलाड़ियों’ की एक ऐसी फौज खड़ी की जा रही है, जो वास्तविक मेहनत करने वाले खिलाड़ियों के भविष्य पर ग्रहण लगा रही है।

फर्जी ‘राष्ट्रीय खिलाड़ी’ बनाने का संदिग्ध खेल

भ्रष्टाचार की जड़ें इस कदर गहरी हो चुकी हैं कि राष्ट्रीय स्तर जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं के लिए उन बच्चों का चयन कागजों पर कर लिया गया, जिन्होंने कभी खेल के मैदान में पसीना तक नहीं बहाया था। जिला क्रीड़ा अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए अपने सुपुत्र शेख कौनेन क्रीड़ा अधिकारी बम्हनी स्कूल के बच्चों को अतिरिक्त लाभ पहुंचाया ऋतुराज साहू जैसे छात्रों को बिना किसी विशेष योग्यता, पिछले प्रदर्शन या अनुभव के ‘राष्ट्रीय खिलाड़ी’ का दर्जा दिलवा दिया। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ऋतुराज साहू के नाम पर रोहित सिंह नामक लड़के को प्रतियोगिता में उतारा गया, जो सीधे तौर पर पहचान की चोरी, दस्तावेजी धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र का मामला प्रतीत होता है।

पहचान की चोरी और खिलाड़ियों का बड़ा हेरफेर
यह धोखाधड़ी केवल ऋतुराज तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि जितेंद्र यादव के स्थान पर अंशु बैगा (निवासी अमलई) को फर्जी तरीके से मैदान में उतारा गया। इस भारी हेरफेर की पुष्टि उपलब्ध तस्वीरों, मैच रिकॉर्ड और स्थानीय चश्मदीदों के साक्ष्यों से स्पष्ट रूप से होती है। जिला प्रशासन की नाक के नीचे हो रहे इस अन्याय के खिलाफ अब पात्र छात्रों ने एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया है। जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपे गए एक विस्तृत शिकायत पत्र में छात्रों ने साक्ष्यों के साथ स्पष्ट किया है कि संभाग स्तर की चयन प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं बरती गईं और नियमों को रद्दी के भाव बेच दिया गया।

चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव और तानाशाही
संभाग स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता (बालक-19 वर्ष) का संदर्भ देते हुए शिकायत में बताया गया कि पूरी चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का नामो-निशान नहीं था। शहडोल संभाग में आयोजित इस प्रक्रिया के दौरान चयनकर्ताओं ने जानबूझकर उन छात्रों को प्राथमिकता दी जो किसी भी मान्यता प्राप्त विद्यालय में नियमित रूप से अध्ययनरत नहीं हैं, जबकि प्रतिदिन मैदान पर अभ्यास करने वाले और पात्र छात्रों को साजिश के तहत बाहर कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इस दौरान रहीम खान, मोहम्मद रईस अहमद और स्वयं जिला क्रीड़ा अधिकारी वहां मौजूद थे, लेकिन नियमों का उल्लंघन खुलेआम होता रहा। जब वास्तविक खिलाड़ियों ने इस धांधली पर आपत्ति जताई, तो उन्हें डराने-धमकाने और मैदान से बाहर करने की धमकी दी गई, जो विभाग की चरम तानाशाही को दर्शाता है।

अवैध टीमें और गैर-विद्यार्थी छात्रों की भागीदारी
नियमों के अनुसार संभाग स्तरीय प्रतियोगिता में प्रत्येक जिले से केवल एक आधिकारिक टीम को सम्मिलित होना चाहिए था, लेकिन नियमों को धता बताते हुए शहडोल संभाग की 2 से 4 अवैध टीमें एक साथ खेल रही थीं। इस फर्जीवाड़े की सूची में अनिकेत साकेत, देव प्रकाश कोल, पुष्पेंद्र सिंह धुर्वे, संजय बैगा, चमन कोल, सूरज गुप्ता, वरुण सिंह, अतुल सिंह, सुजल रजक और रोहित केवट जैसे अनेक नाम शामिल हैं, जो किसी भी स्कूल के नियमित छात्र नहीं हैं। इस पूरी कवायद का एकमात्र उद्देश्य केवल बैकडेट में फर्जी सर्टिफिकेट जारी करना और खेल के नाम पर आने वाले वित्तीय फंड का बंदरबांट करना था।

सेपक टेकरा में नियमों का उल्लंघन और उम्र का फर्जीवाड़ा
भ्रष्टाचार का यह तंत्र केवल फुटबॉल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सेपक टकरा (Under-14) जैसी छोटी आयु वर्ग की प्रतियोगिताओं में भी अपनी पैठ बना चुका है। यहाँ मानसी नामक एक खिलाड़ी को उसके ओवर-एज होने के बावजूद नियमों के विरुद्ध खेलने की अनुमति दी गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित खिलाड़ी पिछले दो वर्षों से सीनियर स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग ले रही है, ऐसे में उसे जूनियर या सब-जूनियर श्रेणी में शामिल करना खेल संहिता का स्पष्ट उल्लंघन है। इस प्रकार के फर्जीवाड़े से उन छोटे और मासूम बच्चों का हक मारा जा रहा है जो अपनी आयु वर्ग में पूरी ईमानदारी से कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

पैसे लेकर फर्जी सर्टिफिकेट बांटने का ‘सिंडिकेट’
छात्रों और उनके अभिभावकों का गंभीर आरोप है कि जिला क्रीड़ा अधिकारी और उनके सहयोगियों ने खेल विभाग को ‘सर्टिफिकेट बेचने की दुकान’ बना दिया है। हर साल भारी भरकम राशि लेकर ऐसे फर्जी स्पोर्ट्स सर्टिफिकेट बांटे जाते हैं जिनका उपयोग बाद में सरकारी नौकरियों में खेल कोटे का लाभ लेने और उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण पाने के लिए किया जाता है। यदि इन जारी किए गए प्रमाण पत्रों की किसी स्वतंत्र एजेंसी से गहन जांच कराई जाए, तो मध्य प्रदेश का एक बहुत बड़ा ‘सर्टिफिकेट स्कैम’ उजागर हो सकता है। इस सिंडिकेट के कारण अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के वे होनहार छात्र हाशिए पर जा रहे हैं, जिनके पास प्रतिभा तो है पर रिश्वत देने के पैसे नहीं।

. उच्च स्तरीय जांच और विभागीय कार्रवाई की मांग
इस पूरे प्रकरण में जिला क्रीड़ा अधिकारी की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध मानी जा रही है। उन पर आरोप है कि वे अपने प्रशासनिक प्रभाव और राजनैतिक संपर्कों का उपयोग कर किसी भी संभावित विभागीय जांच को दबाने या प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। पीड़ित छात्रों ने अब हार मानकर कलेक्टर अनूपपुर, कमिश्नर शहडोल और लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल को पत्र लिखकर इस पूरे नेक्सस की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है। छात्रों का स्पष्ट कहना है कि जब तक चयन समितियों का पुनर्गठन नहीं होता और प्रक्रिया पारदर्शी नहीं की जाती, तब तक जिले का खेल भविष्य अंधकारमय ही रहेगा।

अंतरराज्यीय नेटवर्क और फर्जी खिलाड़ियों की सूची
शिकायत पत्र के साथ उन फर्जी खिलाड़ियों की एक विस्तृत सूची भी संलग्न की गई है जो नियमों को तोड़कर प्रतियोगिता का हिस्सा बने। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि इस खेल में पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ और अन्य जिलों के खिलाड़ियों को भी शामिल किया गया है, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि यह सर्टिफिकेट माफिया गिरोह अंतरराज्यीय स्तर पर सक्रिय हो सकता है। यह एक गंभीर सुरक्षा और प्रशासनिक चूक है, जिस पर खेल विभाग के शीर्ष अधिकारियों को तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों के विरुद्ध कड़ी दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

प्रशासन के खिलाफ बढ़ता आक्रोश और एफआईआर की मांग
यदि शासन और प्रशासन ने समय रहते इस संगठित भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया, तो भविष्य में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के खिलाड़ियों का खेल और निष्पक्षता से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। खेल के पवित्र मैदान को अवैध व्यापार का अड्डा बनाने वाले इन सफेदपोश अधिकारियों के खिलाफ केवल विभागीय जांच ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनके विरुद्ध धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराओं में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य हो गया है। इस खुलासे के बाद जिले के अभिभावकों और खेल प्रेमियों में गहरा रोष व्याप्त है, और वे अब दोषियों की गिरफ्तारी के लिए सड़कों पर उतरने की रणनीति बना रहे हैं।

. प्रशासन की परीक्षा: संरक्षण या निष्पक्ष जांच?
अंततः, अनूपपुर का यह खेल घोटाला सिस्टम की उस सड़ांध को उजागर करता है जो प्रशासन की नाक के नीचे वर्षों से फल-फूल रही थी। अब जिम्मेदारी की गेंद पूरी तरह सरकार और संबंधित विभाग के पाले में है। उन्हें यह तय करना होगा कि वे न्याय की गुहार लगा रहे इन युवा खिलाड़ियों की पुकार सुनेंगे या फिर अपने चहेते खेल माफियाओं को अभयदान देना जारी रखेंगे। पूरे संभाग की दूषित चयन प्रक्रिया को निरस्त कर नए सिरे से, वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ पारदर्शी ट्रायल कराए जाने की मांग अब जन-आंदोलन का रूप लेती जा रही है।