
बिना वर्क ऑर्डर लाखों का भुगतान
अनूपपुर। जिले में विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान व्यवस्थाओं के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाने का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है। दस्तावेजी साक्ष्यों से हुए खुलासे ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जाँच में सामने आया है कि जिस ‘होटल वृंदावन’ को सामग्री आपूर्ति का आधिकारिक वर्क ऑर्डर 14 अक्टूबर 2023 को जारी किया गया था, उसी फर्म ने ऑर्डर मिलने के लगभग 40 दिन पहले यानी 4 सितंबर 2023 से ही सप्लाई शुरू कर दी थी। हैरत की बात यह है कि प्रशासन ने नियमों को ताक पर रखकर इस अवैध सप्लाई का लाखों रुपये का भुगतान भी आनन-फानन में कर दिया।
ये है पूरा मामला?
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, कार्यालय कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी, अनूपपुर द्वारा पत्र क्रमांक 106/927/19/ई/25/निर्वा./लेखा/निविदा/2023 के माध्यम से होटल वृंदावन को भोजन, चाय-नाश्ता और स्टेशनरी की आपूर्ति हेतु वर्क ऑर्डर दिया गया था। किंतु होटल द्वारा प्रस्तुत कैश मेमो (बिल्स) यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि सामग्री की आपूर्ति निविदा प्रक्रिया पूर्ण होने से पहले ही धड़ल्ले से की जा रही थी।

अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में कमलेश तिवारी की भूमिका सबसे अधिक संदेहास्पद नजर आती है। बिलों पर स्पष्ट रूप से उनका नाम अंकित होना यह दर्शाता है कि उन्होंने पदीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर, बिना किसी आधिकारिक स्वीकृति के होटल को मौखिक आदेश दिए। सवाल यह उठता है कि क्या एक अधीनस्थ कर्मचारी के पास इतनी शक्ति थी कि वह शासन की वित्तीय नियमावली को दरकिनार कर सके, या फिर उन्हें ऊपर बैठे रसूखदारों का संरक्षण प्राप्त था? निविदा प्रक्रिया से पहले ही चहेती फर्म से ‘सेटिंग’ कर लेना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उल्लंघन की ओर इशारा करता है।
वहीं, उप जिला निर्वाचन अधिकारी दिलीप पांडे की कार्यप्रणाली भी अब गंभीर जांच के दायरे में है। निर्वाचन जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभाग के प्रभारी होने के नाते, यह उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी थी कि वे भुगतानों और वर्क ऑर्डर की तिथियों का मिलान सुनिश्चित करते। सितंबर के बिलों को अक्टूबर के वर्क ऑर्डर के आधार पर भुगतान की अनुमति देना केवल एक ‘मानवीय चूक’ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय अनियमितता प्रतीत होती है। पर्यवेक्षणीय लापरवाही का यह आलम बताता है कि जिला निर्वाचन कार्यालय में पारदर्शिता का पूर्णतः अभाव था और सरकारी धन की बंदरबांट के लिए नियमों को सुविधानुसार मरोड़ा गया।
भ्रष्टाचार की पुष्टि करते मुख्य बिंदु:
आधिकारिक वर्क ऑर्डर जारी होने से 40 दिन पहले ही गुपचुप तरीके से सप्लाई शुरू कर दी गई।बिलों के अनुसार, निविदा से पहले ही लगभग 1200 पानी की बोतलें, सैकड़ों लंच पैकेट और 5000 डिस्पोजल ग्लास की ‘बिक्री’ कागजों पर दिखाई गई। वही निविदा शर्तों की कंडिका 9 के स्पष्ट प्रावधानों (कार्यादेश के बाद ही अनुबंध और धरोहर राशि जमा करना) का उल्लंघन कर खेल पहले ही सेट कर लिया गया।
इन संदिग्ध बिलों का सत्यापन जिला आपूर्ति अधिकारी द्वारा किया जाना पूरी चैन की मिलीभगत की आशंका को प्रबल करता है।
लाखों के वारे-न्यारे और जांच की मांग
सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए, अकेले एक सप्ताह के भीतर ही होटल ने ₹1 लाख से अधिक का भुगतान प्राप्त कर लिया। नियमानुसार, बिना स्वीकृत दर और बिना कार्यादेश के कोई भी सामग्री स्वीकार नहीं की जा सकती। लेकिन यहाँ न केवल सामग्री ली गई, बल्कि जनता के टैक्स के पैसे से उसका भुगतान भी कर दिया गया।
वर्तमान में, स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर काफी आक्रोश है। बुद्धिजीवियों ने मांग की है कि इस पूरे “सितंबर-अक्टूबर सिंडिकेट” की उच्च स्तरीय जांच की जाए और दोषी अधिकारियों सहित संबंधित फर्म पर तत्काल FIR दर्ज की जाए, ताकि लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव ‘चुनाव’ की आड़ में होने वाले भ्रष्टाचार पर लगाम लग सके।
अब साहब की अपनी मजबूरी है या दलील, आप खुद ही पढ़ लीजिए...”
निर्वाचन के काम मे पुराने बिल ठेकेदार ने लगा दिया होगा। मैं दो माह बाद रिटायर्ड हो रहा हूं। सारा बिल मेरे पास जिला आपूर्ति अधिकारी से पास होने के बाद आता है तब उसका भुगतान होता है। कब वर्क ऑर्डर हुआ कब बिल लगा यह देखना लिपिक का काम है
दिलीप पांडेय, अपर कलेक्टर उप जिला निर्वाचन अधिकारी, अनूपपुर।
जो बिल बना है ठेकेदार ने जो लिखा है सब सही लिखा है। आपको जो छापना है छाप लो। मैं भी देख लूंगा।
कमलेश तिवारी, लिपिक, निर्वाचन शाखा,








