डॉ. राय के रसूख के आगे दम तोड़ रहे दस्तावेज, बल्लभ भवन ने भी साधी चुप्पी

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अजय मिश्र
अनूपपुर।  मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है—क्या रसूखदार अधिकारी नियमों से ऊपर हैं? अनूपपुर जिले के स्वास्थ्य विभाग में मचे घमासान और डॉ. एस.सी. राय (चिकित्सा अधिकारी) के विरुद्ध आई गंभीर जांच रिपोर्ट ने शासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राप्त दस्तावेजों से साफ है कि जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार और नियम विरुद्ध कार्यों के सबूत चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के केंद्र ‘बल्लभ भवन’ ने इस मामले में कार्यवाही से पूरी तरह किनारा कर लिया है।
क्या है पूरा मामला?
पूरा विवाद अनूपपुर में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के पदभार और नियम विरुद्ध नियुक्तियों से जुड़ा है। क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवायें, रीवा संभाग द्वारा कराई गई एक उच्च स्तरीय जांच में डॉ. एस.सी. राय को दोषी पाया गया है। जांच रिपोर्ट (क्रमांक/स्था./राज./2022/4100) के अनुसार, डॉ. राय ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर न केवल पद का दुरुपयोग किया, बल्कि शासन की तबादला नीति की धज्जियां भी उड़ाईं।

जांच रिपोर्ट के ५ सबसे बड़े खुलासे:

न्यायालय की अवहेलना: जब डॉ. बी.डी. सोनवानी को माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर से स्थगन आदेश (Stay Order) मिल चुका था, तब डॉ. राय को पद छोड़ना चाहिए था। लेकिन उन्होंने खुद को ही प्रभारी CMHO बताते हुए कार्य जारी रखा, जो सीधे तौर पर ‘कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट’ की श्रेणी में आता है।
अवैध स्थानांतरण का खेल: जांच में पाया गया कि 31 अगस्त 2021 को, जब पूरे प्रदेश में तबादलों पर प्रतिबंध था, डॉ. राय ने बिना किसी अधिकार के 6 कर्मचारियों के स्थानांतरण आदेश जारी कर दिए। यह शासन की स्पष्ट नीतियों का उल्लंघन था।
भ्रामक जानकारी और कूटनीति: डॉ. राय ने जांच दल के सामने दावा किया कि उन्हें तत्कालीन कलेक्टर ने कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए थे। परंतु, जब कलेक्टर कार्यालय के रिकॉर्ड खंगाले गए, तो ऐसा कोई भी लिखित आदेश नहीं मिला। साफ है कि उन्होंने जांच को गुमराह करने की कोशिश की।
प्रभार का मोह: दस्तावेजों के मुताबिक, डॉ. राय ने डॉ. सोनवानी को जानबूझकर कार्यभार नहीं सौंपा और महत्वपूर्ण शासकीय फाइलों पर अवैध रूप से हस्ताक्षर करते रहे।

जांच अधिकारी की कड़ी टिप्पणी: उपसंचालक डॉ. डी.पी. अग्रवाल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि डॉ. एस.सी. राय द्वारा की गई संपूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः अवैधानिक और नियम विरुद्ध है।

बल्लभ भवन की ‘मेहरबानी’ या मजबूरी?

इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि रीवा संभाग के संयुक्त संचालक ने इस रिपोर्ट के आधार पर डॉ. राय के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक एवं वैधानिक कार्यवाही और उनके द्वारा किए गए सभी अवैध आदेशों को निरस्त करने की अनुशंसा की थी।
दस्तावेज भोपाल स्थित मंत्रालय (बल्लभ भवन) भेजे गए, लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी कोई एक्शन नहीं लिया गया। सूत्रों का कहना है कि डॉ. राय के राजनैतिक रसूख और मंत्रालय में बैठे कुछ रसूखदार अधिकारियों से करीबी संबंधों के कारण फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

प्रशासनिक तंत्र पर सवाल
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की मनमानी का नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र की विफलता है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करता है। जब जांच में दोष सिद्ध हो चुका है, तो फिर कार्यवाही में देरी क्यों? क्या डॉ. राय का रसूख प्रदेश की न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक प्रोटोकॉल से भी बड़ा है?
स्थानीय स्तर पर भी इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि नियमों का पालन करने वाले अधिकारियों को दरकिनार कर, मनमानी करने वालों को संरक्षण दिया जा रहा है। अब देखना यह है कि क्या इस खबर के बाद शासन की नींद टूटती है या डॉ. राय का ‘रसूख’ इसी तरह दस्तावेजों पर भारी पड़ता रहेगा।