कोतमा हादसा: भ्रष्टाचार की नींव पर गिरी इमारत, तीन मासूमों की मौत से दहला जिला

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जांच कमेटी के समक्ष दर्ज हुए बयान
पं अजय मिश्र
अनूपपुर।। जिले के कोतमा नगर के हृदय स्थल में स्थित अग्रवाल लॉज के धराशायी होने से तीन मासूम जिंदगियों की असामयिक मृत्यु हो गई है। इस हृदयविदारक घटना ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है। स्थानीय नागरिकों और प्रत्यक्षदर्शियों का मानना है कि यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि घोर प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का सीधा परिणाम है।
जांच समिति के समक्ष ‘प्रशासनिक संलिप्तता’ के उठे सवाल
हादसे के बाद प्रशासन द्वारा गठित ‘विशेष जांच दल’ और ‘न्यायिक जांच समिति’ को स्थानीय सजग नागरिकों ने पत्र लिखकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। नागरिकों की मांग है कि जांच का दायरा केवल भवन की जर्जरता तक सीमित न रहे, बल्कि इसमें ‘प्रशासनिक संलिप्तता’ के बिंदुओं को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। नागरिकों का आरोप है कि जांच केवल फाइलों तक सीमित रहकर ‘क्लीन चिट’ बांटने का जरिया नहीं बननी चाहिए।

नगर पालिका प्रशासन की संदिग्ध भूमिका और नोटिस का रहस्य
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि नगर पालिका परिषद कोतमा को इस जर्जर निर्माण और अवैध बदलावों की जानकारी समय-समय पर शिकायतों के माध्यम से दी गई थी। अब यह जांच का विषय है कि क्या रिकॉर्ड में इस भवन को पहले कभी जर्जर घोषित कर नोटिस दिया गया था? यदि नोटिस दिया गया था, तो मुख्य नगरपालिका अधिकारी और अध्यक्ष ने इसे खाली कराने या गिराने की अंतिम कार्रवाई क्यों नहीं की?

उपयंत्री उमेश त्रिपाठी पर लापरवाही और अवैध संरक्षण के आरोप
हादसे की तकनीकी जांच में उपयंत्री उमेश त्रिपाठी की भूमिका को मुख्य रूप से संदिग्ध माना जा रहा है। नागरिकों का दावा है कि भवन के अवैध विस्तार और तकनीकी खामियों को चिह्नित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी उपयंत्री की थी। आरोप है कि उन्होंने फील्ड विजिट के दौरान कभी कोई आपत्ति दर्ज नहीं की, जो उनके द्वारा दिए गए अवैध संरक्षण या घोर लापरवाही का प्रमाण है।

‘सुविधा शुल्क’ और भ्रष्टाचार के प्रभाव में नियमों की बलि
जांच समिति को सौंपे गए ज्ञापनों में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि प्रभावशाली संपर्कों और ‘सुविधा शुल्क’ के प्रभाव में सुरक्षा मानकों को ताक पर रखा गया। आशुतोष सराफ जैसे नागरिकों का कहना है कि भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारतें अंततः आम आदमी की कब्रगाह बन जाती हैं। लोगों का मानना है कि अधिकारियों की जानकारी में होने के बावजूद अवैध निर्माण को निरंतर संरक्षण दिया गया।

रसूखदारों और ‘सफेदपोश’ गुनहगारों को बेनकाब करने की मांग
कोतमा की सड़कों पर व्याप्त जन-आक्रोश केवल मुआवजे के लिए नहीं, बल्कि उन ‘सफेदपोश’ चेहरों को बेनकाब करने के लिए है जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए नियमों की अनदेखी की। नागरिकों की स्पष्ट मांग है कि जांच समिति केवल भवन मालिक जैसी ‘मछली’ पर गाज न गिराए, बल्कि मुख्य सूत्रधारों—सीएमओ और उपयंत्री की संपत्ति और उनके कार्यकाल के दौरान दी गई निर्माण अनुमतियों की भी सघन जांच हो।

इरादतन हत्या और भ्रष्टाचार की धाराओं के तहत कार्रवाई की अनुशंसा
जांच समिति से आग्रह किया गया है कि जिम्मेदार अधिकारियों विशेषकर सीएमओ और उपयंत्री उमेश त्रिपाठी के विरुद्ध इरादतन हत्या और भ्रष्टाचार की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाए। नागरिकों का तर्क है कि जब तक व्यवस्था के इन जिम्मेदार स्तंभों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक मुआवजे का मरहम सिस्टम के घावों को नहीं भर पाएगा।

न्याय की प्रतीक्षा: पीड़ित परिवारों के लिए एक नजीर की उम्मीद
राजकुमार, पवन साई, मोहन यादव और प्रशांत जैसवाल जैसे कई नागरिकों ने 17 अप्रैल 2026 को हस्ताक्षरित पत्रों के माध्यम से निष्पक्ष जांच की आशा व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि प्रशासन ने रसूखदारों के दबाव में निष्पक्षता से समझौता किया, तो यह लोकतंत्र की हार होगी। उम्मीद की जा रही है कि इस जांच से पीड़ित परिवारों को न्याय मिलेगा और भविष्य के लिए एक ऐसी नजीर पेश की जाएगी जिससे दोबारा ऐसे हादसे न हों।